बिहार: बिहार की सियासी धरती पर एक दौर ऐसा था, जब चुनावी मैदान में जनता नहीं, बाहुबली नेताओं की धमक तय करती थी कि किसे जीतना है और किसे हारना। चुनाव प्रचार में बंदूकें भाषण से ज्यादा असर डालती थीं, और “दबंग छवि” नेता की ताकत मानी जाती थी। लेकिन अब सियासत की चाल बदल चुकी है—बिहार में बाहुबली राज की वो ‘गूंज’ अब इतिहास बनती नजर आ रही है।
राजनीति के मैदान से बाहुबलियों की रवानगी
कभी जिन बाहुबली नेताओं की गिनती बिहार की सबसे ताकतवर हस्तियों में होती थी, आज वे खुद अपने टिकट को लेकर असमंजस में हैं। एक जमाना था जब आनंद मोहन, अनंत सिंह, शहाबुद्दीन, प्रभुनाथ सिंह, सूरजभान सिंह, मुन्ना शुक्ला, सुनील पांडेय, रामा सिंह, पप्पू यादव जैसे नाम सियासत की धुरी थे। लेकिन अब यह धुरी जंग खा चुकी है।
आनंद मोहन: एक समय का राजा, अब मंच से बाहर
राजपूत राजनीति के पुरोधा माने जाने वाले आनंद मोहन कभी तिरहुत डिवीजन के सबसे ताकतवर चेहरों में शामिल थे। उनकी सियासी चमक इतनी थी कि पूरा शिवहर इलाका उनके नाम पर वोट करता था। लेकिन DM जी. कृष्णैया की हत्या मामले में उम्रकैद की सजा ने उनके राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगा दिया। अब सजा माफी के बाद जेल से बाहर जरूर हैं, लेकिन नीतीश कुमार जैसे नेता भी उनके साथ मंच साझा करने से बचते हैं। उनकी पत्नी लवली आनंद JDU से सांसद हैं, बेटा चेतन RJD से विधायक है, लेकिन किसी को भी टिकट मिलेगा या नहीं, ये तय नहीं।
अनंत सिंह: मोकामा का राजा, अब सियासी निर्वासन में
अनंत सिंह, जिन्हें ‘छोटे सरकार’ कहा जाता था, मोकामा से चार बार विधायक रहे। कभी जेडीयू, कभी निर्दलीय, और फिर RJD से चुनाव जीतकर दबदबा बनाए रखा। लेकिन कोर्ट से सजा मिलने के बाद अब खुद चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी पत्नी नीलम देवी ने विरासत संभाली है, लेकिन नीतीश कुमार उन्हें फिर से मौका देंगे या नहीं, इस पर बड़ा सवाल है। जेडीयू और RJD के बीच पेंच फंसा हुआ है।
शहाबुद्दीन: सिवान का ‘डॉन’, लेकिन अब नाम तक फीका
RJD के दौर में सिवान पर एकछत्र राज करने वाले शहाबुद्दीन अब नहीं रहे। जेल में रहते हुए उनकी मौत हो गई। उनकी पत्नी हिना शहाब कई बार चुनाव हार चुकी हैं, और बेटा ओसामा शहाब भी फिलहाल सियासी शुरुआत ही कर रहे हैं। आरजेडी में लौटने के बाद भी उनके लिए कोई सीट तय नहीं है। रघुनाथपुर सीट पर टिकट को लेकर पार्टी के भीतर ही टकराव है।

प्रभुनाथ सिंह: हाजीपुर का शेर, अब सिर्फ सजा की पहचान
लालू यादव के करीबी रहे प्रभुनाथ सिंह का दबदबा कभी सारण क्षेत्र में अपराजेय माना जाता था। लेकिन अब उम्रकैद की सजा और RJD से दूरी ने उन्हें हाशिए पर पहुंचा दिया है। बेटे रणधीर सिंह और भतीजे सुधीर सिंह दोनों चुनाव हार चुके हैं। रणधीर ने RJD छोड़ जेडीयू का दामन थाम लिया, लेकिन अब भी टिकट को लेकर स्थिति साफ नहीं।
सूरजभान सिंह: ‘दबंग सांसद’ से मौन दर्शक तक
सूरजभान सिंह, मोकामा से विधायक और मुंगेर से सांसद रहे। पत्नी वीणा देवी सांसद बनीं, लेकिन खुद सजा के चलते चुनाव नहीं लड़ सकते। LJP (रामविलास) में होने के बावजूद अब उनका राजनीतिक असर कमजोर पड़ गया है। मुंगेर बेल्ट में अब अनंत सिंह और ललन सिंह जैसे नाम ज्यादा चर्चित हैं।
मुन्ना शुक्ला: अन्नू देवी की सियासत भी अब कमजोर
मुन्ना शुक्ला का नाम भी कभी ‘लालगंज के बाहुबली’ के रूप में लिया जाता था। अब पत्नी अन्नू देवी राजनीति में हैं, लेकिन RJD में शामिल होने के बावजूद भविष्य असमंजस में है। पार्टी टिकट देगी या नहीं, यह भी तय नहीं।

सुनील पांडेय: भोजपुर के दबंग की विरासत में दरार
भोजपुर में बाहुबली नेता सुनील पांडेय का बड़ा नाम था। उनके बेटे विशाल पांडेय बीजेपी से विधायक हैं, लेकिन पिता की सियासी पकड़ अब कमजोर पड़ रही है। विरोधी सुदामा यादव का RJD से उदय उनकी मुश्किलें और बढ़ा रहा है।
रामा सिंह: ठाकुर नेता की रणनीति भी धुंधली
पांच बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके रामा सिंह ने 2020 में RJD से चुनाव लड़ा था, 2024 में LJD का दामन थामा है। ठाकुर वोट बैंक के सहारे राजनीति करते रहे, लेकिन अब सीट और रणनीति दोनों अस्पष्ट हैं।
पप्पू यादव: कोसी का दबंग नेता, अब खुद को बदलने में व्यस्त
कभी कोसी क्षेत्र का सबसे बड़ा नाम रहे पप्पू यादव अब सॉफ्ट छवि गढ़ने में जुटे हैं। पत्नी रंजीता रंजन लगातार चुनाव हार रही हैं, और पप्पू खुद भी किसी बड़ी पार्टी में शामिल नहीं हो पा रहे। RJD और कांग्रेस दोनों ने उन्हें दरकिनार कर दिया।
क्यों खत्म हो रहा है बिहार में बाहुबली राजनीति का दौर?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार की जनता अब छवि, विकास और विश्वसनीयता को प्राथमिकता दे रही है। बाहुबली नेताओं के खिलाफ लंबी अदालती लड़ाइयों, सजाओं, विवादों और अपराध से जुड़ी छवि ने उन्हें जनता से दूर कर दिया है। राजनीति का ‘डर’ अब वोट नहीं दिलाता, बल्कि नुकसान पहुंचा रहा है। दूसरी तरफ, राजनीतिक दल भी अब अपने चुनावी एजेंडे को बदल चुके हैं। JDU, BJP, RJD या कांग्रेस—कोई भी पार्टी अब खुले तौर पर बाहुबली छवि वाले नेताओं को टिकट देने में रुचि नहीं दिखा रही। उनके लिए अब जातिगत संतुलन से ज्यादा छवि और जमीन पर पकड़ मायने रखती है।
बिहार की राजनीति का नया चेहरा
बिहार की राजनीति अब एक नई करवट ले रही है—जहां बाहुबली नहीं, विकास की बात होती है। जहां बंदूक की धमक नहीं, युवा नेतृत्व की बात होती है। और सबसे बड़ी बात—अब जनता पूछती है: “काम क्या किया?” अब न सिर्फ नेताओं की उम्मीदवारी संकट में है, बल्कि उनके परिवारवाद की राजनीति भी दम तोड़ती नजर आ रही है। बाहुबली युग अब इतिहास के पन्नों में है, और नए दौर की राजनीति अपने कदम जमा रही है।
अब बिहार में गूंजता है लोकतंत्र का नारा—not बाहुबल, न वंशवाद—सिर्फ विकास और जवाबदेही।



