पटना: Better Health महिलाओं की पोषण जरूरतें उम्र के साथ बदलती रहती हैं – किशोरावस्था से मातृत्व तक यह जीवनचक्र स्वास्थ्य की आधारशिला है। WHO के अनुसार, महिलाओं-किशोरियों में आयरन की कमी वैश्विक पोषण समस्या है, जो मातृ-शिशु स्वास्थ्य पर सीधा असर डालती है। UNICEF की रिपोर्ट ‘अंडरनरिश्ड एंड ओवरलूक्ड’ में कहा गया कि महिलाओं का पोषण नजरअंदाज करने से पूरी पीढ़ी प्रभावित होती है – एनीमिया से समयपूर्व प्रसव और कम वजन वाले शिशु का खतरा बढ़ता है।
बिहार में यह चुनौती बड़ी है, जहां किशोरियों में आयरन-एनीमिया की दर लड़कों से ज्यादा है, कारण सीमित आहार और जानकारी की कमी। पटना की 18 वर्षीय शालू कुमारी (बदला नाम) कहती हैं – रोज चावल-दाल ही मिलती है, आयरन गोली का फर्क समझ नहीं आता। सीतामढ़ी की 26 वर्षीय गर्भवती सुनीता बताती हैं – डॉक्टर कहते हैं खून कम है, आंगनवाड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है।
पटना AIIMS की एडिशनल प्रोफेसर डॉ. इंदिरा प्रसाद बताती हैं कि किशोरावस्था में विटामिन A, D, B12 की कमी से एनीमिया, कमजोर हड्डियां और विकास रुकता है; प्रजनन आयु में यही विटामिन हार्मोन संतुलन और स्वस्थ गर्भधारण के लिए जरूरी हैं; गर्भावस्था-स्तनपान में कमी मां-शिशु दोनों को प्रभावित करती है; 40+ और रजोनिवृत्ति में विटामिन D, E, B12 हड्डियां-नसों की रक्षा करते हैं। डॉ. मोनिका अनंत कहती हैं कि पोषण पखवाड़ा, एनीमिया मुक्त भारत और आंगनवाड़ी प्रयास अच्छे हैं, लेकिन सप्लीमेंट से आगे जीवनचक्र आधारित विविध आहार और व्यवहार बदलाव जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि उम्र-विशेष पोषण कार्यक्रमों से बिहार में महिलाओं-किशोरियों का स्वास्थ्य सुधरेगा और अगली पीढ़ी मजबूत बनेगी।



