युग दृष्टा और ईमानदारी के पर्याय थे पूर्व मंत्री सरयू मिश्र, 108वीं जयंती पर उमड़ा जनसैलाब

प्रिंस कुमार/अररिया : बिहार सरकार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री स्वर्गीय सरयू मिश्र की 108वीं जयंती गुरुवार को उनके पैतृक गांव भद्रेश्वर स्थित समाधि स्थल पर गरिमामय वातावरण में मनाई गई। सरयू मिश्र मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और समाजसेवी शंभूनाथ मिश्र ने की। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह ने उनके तैलचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।

सात बार के विधायक: सड़क से सदन तक गूंजती थी आवाज
जयंती समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने सरयू बाबू के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र से लगातार सात बार (1962 से 1990 तक) प्रतिनिधित्व करने वाले सरयू मिश्र ईमानदारी के पर्याय थे। अपने 28 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए इस पिछड़े क्षेत्र के विकास की नई इबारत लिखी। वे एक ऐसे ‘युग दृष्टा’ थे जिन्होंने हमेशा वर्ग-विहीन और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का सपना देखा।

गरीबों के मसीहा और गंगा-जमुनी तहजीब के संवाहक
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कांग्रेस विधायक मनोज ऋषिदेव ने सरयू बाबू को याद करते हुए कहा, “वे न केवल एक कुशल नेता थे, बल्कि एक महान संघर्षशील व्यक्ति भी थे। उनके कार्यकाल में क्षेत्र में आपसी भाईचारा और गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूती मिली। गरीबों पर होने वाले अन्याय के खिलाफ वे हमेशा मुखर रहे। आज भी उनकी कमी खटकती है।” विधायक ने सरयू बाबू के अधूरे सपनों को पूरा करने और क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

बहुआयामी व्यक्तित्व: मंत्री से लेकर श्रमिक नेता तक का सफर
समारोह की अध्यक्षता कर रहे शंभूनाथ मिश्र ने उनके राजनैतिक सफर के विभिन्न पहलुओं को साझा किया। उन्होंने बताया कि सरयू बाबू ने न केवल स्वास्थ्य मंत्री और लघु सिंचाई मंत्री के रूप में बिहार की सेवा की, बल्कि: बिहार राज्य वित्त निगम के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। पुराने पूर्णिया जिला परिषद के अध्यक्ष रहे। बिहार जूट बोर्ड के डायरेक्टर और इंटक (INTUC) के सफल श्रमिक नेता के रूप में मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी।

जन-जन के हृदय में आज भी जीवित हैं सरयू बाबू
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सरयू मिश्र मिथिलांचल के ऐसे सपूत थे, जिन्होंने अपने कर्म और ईमानदारी के बल पर राज्य स्तर पर पहचान बनाई। यही कारण है कि राजनीति से हटने के दशकों बाद भी वे अपने विचारों और कार्यों के माध्यम से लोगों के दिलों में जीवित हैं। समारोह के अंत में उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया गया। इस अवसर पर भारी संख्या में स्थानीय ग्रामीण, राजनैतिक कार्यकर्ता और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

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