पटना: Bihar News बिहार ने पिछले दो दशकों में मातृ मृत्यु अनुपात को 374 से घटाकर करीब 100 प्रति लाख जीवित जन्म तक ला पटका है, जो देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य टर्नअराउंड में से एक है। यह चमत्कार न तो किसी एक दवा से हुआ, न किसी बड़े बजट से, बल्कि आशा-एएनएम की घर-घर जागरूकता, समय पर रेफरल, प्रसवोत्तर रक्तस्राव किट, एनीमिया की पहले पहचान और जिला स्तर के छोटे-छोटे नवाचारों से हुआ।
सारण में आशा कार्यकर्ताओं ने खतरे के लक्षण बताते-बताते थकती नहीं, वैशाली के महुआ PHC में डॉ. विनीता सिंह की टीम सीमित संसाधनों में भी हर मिनट तैयार रहती है, मुजफ्फरपुर के एमसीएच में “संजीवनी कोष” कहलाने वाली रक्तस्राव किट ने निशा सोनी जैसी सैकड़ों महिलाओं की जान बचाई। सितंबर 2025 तक 4.14 लाख स्वास्थ्य-पोषण दिवसों में 49 हजार से ज्यादा हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहले ही पहचान कर ली गई, ताकि प्रसव से पहले ही खतरा टल जाए। एम्स पटना की डॉ. इंदिरा प्रसाद कहती हैं – “ज्यादातर मौतें इसलिए होती थीं क्योंकि महिला बिना जांच, एनीमिया लिए और रेफरल में देरी के साथ आती थी; अब प्रोटोकॉल इतना सख्त है कि रक्तस्राव की पहली बूंद दिखते ही पूरी मशीनरी एक्टिवेट हो जाती है।”।
गांव की आरती देवी अब कहती है – “पहले लोग कहते थे घर पर ही बच्चा हो जाएगा, अब हम खुद अस्पताल भागते हैं”। बिहार ने साबित कर दिया कि जब समुदाय और सिस्टम एक साथ चलें तो प्रसव डरावना नहीं, सुरक्षित और भरोसेमंद हो जाता है। 2030 तक MMR 70 तक लाने का लक्ष्य अब सिर्फ सपना नहीं, हकीकत बनने की राह पर है।



