अंग इंडिया संवाददाता : दरभंगा।
संघर्ष, संकल्प और साहस की मिसाल बन चुके दरभंगा जिले के जलालुद्दीन आज युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। एक साधारण और गरीब परिवार में जन्मे जलालुद्दीन के पिता जीवनयापन के लिए बिस्कुट बेचने का कार्य करते थे। कठिन आर्थिक हालात और जीवन में आई गंभीर दुर्घटनाओं के बावजूद न पिता ने हार मानी और न ही बेटे ने। इसी जज्बे का परिणाम है कि आज जलालुद्दीन वैशाली जिले में अपर जिला जनसंपर्क पदाधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

जलालुद्दीन का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। महज 7 वर्ष की उम्र में एक ट्रेन दुर्घटना में उनका बायां पैर घुटने के पास से कट गया। यह हादसा किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकता था, लेकिन जलालुद्दीन ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने खेल को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखा और साइकिलिंग को अपना जुनून बना लिया।
साइकिलिंग के क्षेत्र में जलालुद्दीन ने असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। बिहार चैंपियनशिप, सीमांचल एवं जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं से लेकर नेशनल और अंतरराष्ट्रीय साइकिलिंग प्रतियोगिताओं तक उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। खास बात यह है कि वर्ष 2016 में जब वे पहली बार पूर्णिया साइक्लिंग एसोसिएशन के माध्यम से प्रतियोगिता में भाग लेने आए थे, तब उनके पास एक साधारण साइकिल थी और सहारे के लिए हाथ में लाठी। बावजूद इसके उन्होंने चौथा स्थान हासिल कर सबको चौंका दिया।

इसके बाद उन्होंने प्रोफेशनल साइकिलिंग में प्रवेश किया और लगातार मेहनत के बल पर आगे बढ़ते गए। ताजिकिस्तान में आयोजित एशियन साइक्लिंग चैंपियनशिप में भाग लेकर उन्होंने पांचवां स्थान प्राप्त किया, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
शैक्षणिक रूप से भी जलालुद्दीन ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने इतिहास में स्नातक (हिस्ट्री ऑनर्स) की पढ़ाई पूरी की और प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर यह साबित कर दिया कि शारीरिक सीमाएं कभी भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकतीं।
जलालुद्दीन की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो परिस्थितियों से हार मान लेते हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादे, निरंतर मेहनत और आत्मविश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है।



