प्रसव पूर्व जांच में आई तेजी; जोखिम भरी गर्भावस्थाओं को चिन्हित कर जीवन बचाने में जुटा स्वास्थ्य विभाग

पटना: बिहार में मातृ स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए प्रसव पूर्व जांच (एएनसी) में आई तेजी अब साफ दिख रही है, जहां अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य भर में उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं (एचआरपी) की पहचान पहले से कहीं अधिक प्रभावी हुई है। पूर्णिया जिला इस मुहिम में सबसे आगे है, जहां 13.3 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में जोखिम के लक्षण समय रहते पकड़े गए, जिससे एनीमिया, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी जटिलताओं का प्रबंधन पहले ही शुरू हो जाता है।

गया, शेखपुरा, मधुबनी, जहानाबाद, भागलपुर और भोजपुर जैसे जिलों ने भी 11 प्रतिशत से अधिक की पहचान दर हासिल की है, जो स्वास्थ्य कर्मियों और आशा कार्यकर्ताओं की घर-घर जागरूकता और नियमित जांच का नतीजा है। डॉ. इंदिरा प्रसाद (पटना एम्स) ने कहा कि समय पर पहचान से सुरक्षित प्रसव की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि चिकित्सा तंत्र को जटिलताओं से निपटने का पर्याप्त समय मिल जाता है।

इस रणनीति से रेफरल और फॉलो-अप सुविधाएं आसान हो गई हैं, जिससे अस्पतालों में संस्थागत प्रसव बढ़ रहा है और प्रसवकालीन अनहोनी की आशंका कम हुई है। पटना, जमुई और कटिहार जैसे जिलों में भी शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रगति दिख रही है। यह बदलाव मातृ मृत्यु दर को लगातार घटाने की दिशा में बिहार स्वास्थ्य विभाग की मजबूत प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जहां अब स्वास्थ्य प्रणाली केवल प्रसव तक सीमित नहीं, बल्कि गर्भावस्था के हर चरण में सक्रिय निगरानी कर रही है।

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