PURNEA NEWS : “बिना कॉपी जांचे निकला पीजी-पीएचडी का रिजल्ट! पूर्णिया यूनिवर्सिटी में हुआ ऐसा कांड कि शिक्षा भी शर्मसार हो जाए”

PURNEA NEWS /किशन भारद्वाज  : कल्पना कीजिए कि आप पीजी या पीएचडी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं देते हैं, महीनेभर तैयारी करते हैं, और फिर अचानक पता चलता है कि आपका मूल्यांकन किसी शिक्षक ने किया ही नहीं! सुनकर हैरान रह गए ना? लेकिन यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि पूर्णिया विश्वविद्यालय में हुआ ऐसा ‘शैक्षणिक घोटाला’ है, जिसने न सिर्फ छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है, बल्कि पूरे बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, वर्ष 2023-24 के यूजी, पीजी और पीएचडी प्रवेश परीक्षाओं की कॉपियों का मूल्यांकन बिना किसी शिक्षक के कर दिया गया। हैरानी की बात तो यह है कि न सिर्फ मूल्यांकन हुआ, बल्कि परिणाम भी धड़ाधड़ जारी कर दिए गए।

कैसे फूटा घोटाले का ‘बम’?

17 फरवरी को एक जांच टीम का गठन हुआ, जिसने 21 मार्च को कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में परीक्षा विभाग की लापरवाहियों की परत-दर-परत पोल खोली गई। जांच में खुलासा हुआ कि परीक्षा नियंत्रक (सीओई) प्रो. अजय कुमार पांडे के कार्यकाल में परीक्षा प्रणाली पूरी तरह ‘मजाक’ बन चुकी थी। बिना मूल्यांकन के कॉपियों के रिजल्ट प्रकाशित करना, शिक्षा से विश्वास उठ जाने जैसा है।

19 अप्रैल को गिरी गाज, सीओई सस्पेंड!

रिपोर्ट के आधार पर कुलपति ने तत्काल कार्रवाई करते हुए 19 अप्रैल को प्रो. पांडे को निलंबित कर दिया और उन्हें मारवाड़ी कॉलेज किशनगंज में सेवा देने का आदेश दिया गया। कुलाधिपति कार्यालय को भी इस कार्रवाई की जानकारी दे दी गई है।

‘सीओई’ पद की गरिमा को किया तार-तार

सीओई यानी Controller of Examination वह पद होता है, जो विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रक्रिया का संपूर्ण प्रभारी होता है—समय निर्धारण, संचालन, मूल्यांकन से लेकर परिणाम जारी करने तक। लेकिन जब यही पद भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ जाए, तो शिक्षा व्यवस्था की नींव हिल जाती है।

क्या यही है ‘गुणवत्ता’ जिसकी बात की थी?

2018 में स्थापित पूर्णिया विश्वविद्यालय को सीमांचल क्षेत्र के गरीब और पिछड़े छात्रों को गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं ने विश्वविद्यालय की साख को ही मिट्टी में मिला दिया है। चार जिलों (पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज) में फैले इस विश्वविद्यालय में 37 कॉलेज, जिनमें तीन लॉ कॉलेज भी शामिल हैं, अब सवालों के घेरे में हैं।

अब सवाल उठता है – क्या होगा उन छात्रों का, जिन्होंने मेहनत की? क्या विश्वविद्यालय माफी मांगकर अपना पल्ला झाड़ लेगा? और क्या ऐसे घोटालों की जांच सीबीआई जैसे उच्चस्तरीय एजेंसी से नहीं होनी चाहिए?

पूर्णिया विश्वविद्यालय में जो हुआ, वह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है—और यह मजाक अब ज्यादा दिन नहीं चल सकता।

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