Purnia News: पूर्णिया में हाईकोर्ट बेंच की मांग फिर से तेज, सामाजिक कार्यकर्ता ने न्यायिक असमानता दूर करने को लेकर लिखा पत्र

पूर्णिया: Purnia News बिहार के सीमांत और ऐतिहासिक जिले पूर्णिया में हाईकोर्ट बेंच की वर्षों से लंबित मांग को एक बार फिर मजबूती से उठाया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुमार श्रीवास्तव ने पटना हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तारपूर्वक पत्र लिखकर इस न्यायसंगत मांग को गंभीरता से स्वीकार करने की अपील की है। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि पूर्णिया के 100 किलोमीटर त्रिज्या के भीतर आने वाले अररिया, कटिहार, किशनगंज, मधेपुरा, सुपौल, सहरसा, फारबिसगंज, बनमनखी और भागलपुर समेत लगभग 10 जिले पटना उच्च न्यायालय से 250 से 450 किलोमीटर दूर हैं। इस क्षेत्र की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से वंचित है, जिससे उन्हें समय पर उच्च स्तरीय न्याय मिल पाना बेहद कठिन हो जाता है।

श्रीवास्तव ने कहा कि पटना हाईकोर्ट तक बार-बार आना इस क्षेत्र के आम नागरिकों के लिए न केवल महंगा, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से भी थकाऊ प्रक्रिया है, जिससे न्याय से भरोसा टूटता जा रहा है। पूर्णिया में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के लिए आधारभूत संरचना पहले से ही मौजूद है—जैसे कि अंग्रेजों के जमाने से स्थापित सिविल कोर्ट परिसर, विरासत भवन घोषित उत्तर, पूर्व और पश्चिम विंग तथा 100 एकड़ में फैला जिला जज का आवासीय क्षेत्र। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि कर्नाटक (धारवाड़ और गुलबर्गा), महाराष्ट्र (नागपुर और औरंगाबाद), पश्चिम बंगाल (जलपाईगुड़ी) और हिमाचल प्रदेश (धर्मशाला – प्रस्तावित) जैसे राज्यों में पहले से हाईकोर्ट की बेंचें कार्यरत हैं, जबकि बिहार जैसे जनसंख्या की दृष्टि से बड़े और सामाजिक रूप से पिछड़े राज्य में एक भी हाईकोर्ट बेंच नहीं है, जो एक प्रकार की न्यायिक असमानता को दर्शाता है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्णिया में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना से क्षेत्रीय लोगों को कम खर्च में, कम समय में और अधिक सुलभता से न्याय मिल सकेगा, जिससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि मामलों का त्वरित निपटारा भी सुनिश्चित हो सकेगा। इससे अधिवक्ताओं को भी स्थानीय स्तर पर पेशेवर अवसर मिलेंगे और क्षेत्र में कानूनी जागरूकता बढ़ेगी, जो सामाजिक और आर्थिक विकास को नया आयाम देगा। विजय श्रीवास्तव ने अपने पत्र की प्रतिलिपि राज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय विधि मंत्री को भी भेजते हुए इस न्यायिक असमानता को दूर करने और करोड़ों लोगों की भावनाओं को सम्मान देने की अपील की है। उनका कहना है कि यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं होगा, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आशाओं, अपेक्षाओं और न्याय के अधिकार को मूर्त रूप देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होगा।

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