संपादकीय/
लोकसभा में हाल के दिनों में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने देश के लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा यह संकेत दिया जाना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा को लेकर आशंका थी, कोई सामान्य बात नहीं है। यदि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर देश के प्रधानमंत्री को सुरक्षा कारणों से सदन में आने से रोकना पड़े, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।
प्रधानमंत्री किसी दल विशेष के नेता नहीं होते, वे पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। संविधान ने उन्हें देश की कार्यपालिका का सर्वोच्च दायित्व सौंपा है। ऐसे में यदि उनके खिलाफ किसी प्रकार के हमले की योजना बनाई जाती है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, तो वह न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।
यह तर्क देना कि महिलाएं आगे थीं या विरोध प्रदर्शन संसदीय अधिकार के तहत था, पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हो सकता। विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन हिंसा या हिंसा की आशंका लोकतंत्र का अपमान है। यदि वास्तव में प्रधानमंत्री पर हमला करने जैसी कोई योजना थी या सुरक्षा एजेंसियों को ऐसी सूचना मिली थी, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि उस मामले में अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या संसद के भीतर कानून लागू नहीं होता? क्या सांसद कानून से ऊपर हैं?
जब 31 साल पुराने मामले में पूर्व सांसद पप्पू यादव को गिरफ्तार किया जा सकता है, तो फिर संसद के भीतर प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती? कानून सबके लिए समान है—चाहे वह आम नागरिक हो, सांसद हो या मंत्री। संविधान किसी को भी कानून से ऊपर नहीं रखता।
संसदीय मर्यादा का अर्थ केवल भाषण और बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि संसद के भीतर सुरक्षा, अनुशासन और कानून का पालन हो। यदि संसद में ही प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं हैं, तो देश के आम नागरिक की सुरक्षा की कल्पना कैसे की जा सकती है?
लोकसभा अध्यक्ष और संसद प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे इस तरह के मामलों में केवल राजनीतिक संतुलन साधने के बजाय संवैधानिक मजबूती दिखाएं। यदि खतरे की आशंका थी, तो दोषियों की पहचान, जांच और कार्रवाई आवश्यक है। सुरक्षा व्यवस्था को इतना मजबूत होना चाहिए कि किसी भी प्रकार की हिंसा या अराजकता की संभावना को उसी क्षण समाप्त किया जा सके।
हाल के दिनों में यह भी चर्चा में रहा कि भारत में भी नेपाल जैसी ‘जेनजी’ घटनाओं की तर्ज पर सत्ता को अस्थिर करने के प्रयास किए गए। यह कोई छोटी बात नहीं है कि ऐसे प्रयासों के बावजूद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था सुरक्षित रही। इसका श्रेय देश की सुरक्षा एजेंसियों, सरकार और सबसे अधिक भारत की जागरूक जनता को जाता है, जिसने किसी भी तरह की अराजकता को स्वीकार नहीं किया।
लेकिन यहीं से एक नई दुविधा भी जन्म लेती है। जब भारत की सुरक्षा व्यवस्था इतनी सक्षम है कि वह वैश्विक शक्तियों से टक्कर लेने की क्षमता रखती है, तो फिर पड़ोसी देशों में हो रहे घटनाक्रमों पर भारत की प्रतिक्रिया इतनी कमजोर क्यों दिखती है? बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के मुद्दे पर भारत की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि सरकार की नीति और प्राथमिकताओं में स्पष्टता का अभाव है।
एक ओर सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है, तो दूसरी ओर कुछ नीतियां और कानून समाज को जातियों में बांटने की आशंका पैदा करते हैं। आज का भारत 60 साल पहले वाला भारत नहीं है। हर हाथ में मोबाइल है, हर घर में टीवी है, समाज जागरूक है। ऐसे समय में यदि कोई नीति समाज में विभाजन की भावना को बढ़ाती है, तो वह लोकतंत्र और सामाजिक एकता दोनों के लिए घातक हो सकती है। यह संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने समय रहते हस्तक्षेप कर सामाजिक विभाजन की संभावनाओं पर रोक लगाने का प्रयास किया।
लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन अराजकता नहीं। विरोध जरूरी है, लेकिन हिंसा नहीं। और सत्ता परिवर्तन की राजनीति जरूरी है, लेकिन देश के सर्वोच्च पद की गरिमा और सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं।
आज आवश्यकता है कि संसद में कानून और मर्यादा दोनों को समान रूप से लागू किया जाए। क्योंकि यदि संसद कमजोर होगी, तो लोकतंत्र कमजोर होगा। और यदि लोकतंत्र कमजोर हुआ, तो देश की सुरक्षा और स्थिरता दोनों खतरे में पड़ जाएंगी।


