वाराणसी: वाराणसी में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए जातिगत भेदभाव संबंधी नियमों पर तीखा विरोध जताते हुए कहा कि ये नियम सनातन धर्म के विरुद्ध हैं। उनका आरोप है कि इस कानून के माध्यम से हिंदू समुदाय को दो हिस्सों में बांटने का प्रयास किया जा रहा है, जो स्वीकार्य नहीं है। शंकराचार्य ने कहा कि सरकार और संसद द्वारा पारित इस कानून को तुरंत वापस लेना चाहिए, क्योंकि यह नियम समुदाय में विभाजन पैदा करने वाला और समाज को अस्थिर करने वाला है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट केवल संवैधानिक वैधता की जांच कर सकता है और नियमों को बदलने का अधिकार उसके पास नहीं है।
अविमुक्तेश्वरानंद ने आगे कहा कि सवर्ण समाज पहले से ही सड़क पर आंदोलन कर रहा है, जबकि दूसरा समाज अभी बाहर नहीं आया है। उनका मानना है कि यह लड़ाई दोनों के हित में है और दोनों समाजों को मिलकर खड़ा होना चाहिए ताकि हिंदू समुदाय को विभाजित करने का प्रयास विफल रहे। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि यह कानून हिंदू समुदाय को दो हिस्सों में बांटने का एक प्रयोग है, और इसे समाज के हित के लिए तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, उन्होंने प्रयागराज में माघ मेला के दौरान हुए विवाद का भी जिक्र किया, जब प्रशासन और पुलिस ने उनके और उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की थी। शंकराचार्य ने कहा कि सरकार को माफी मांगने या सुधार करने का अवसर दिया गया, लेकिन उन्होंने इसे सुधारने में असफलता दिखाई। शंकराचार्य ने साफ शब्दों में कहा कि इस मामले में न्याय की उम्मीद इस सरकार से नहीं की जा सकती और इसे लेकर पूरी स्थिति जनता के सामने स्पष्ट हो चुकी है। उनका यह बयान UGC नियमों के खिलाफ बढ़ते विरोध और सनातन धर्म की रक्षा के संदेश के रूप में देखा जा रहा है।



