अंग इंडिया संवाददाता : पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा किसी रंग की हो रही है, और वह है हरा। लेकिन यह तृणमूल कांग्रेस के झंडे का रंग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में दिखाई दी वह रहस्यमयी ‘ग्रीन फाइल’ है, जिसने राज्य से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है। विधानसभा चुनाव में अब महज तीन-चार महीने शेष हैं और ऐसे में कोलकाता की सड़कों से लेकर दिल्ली की अदालतों तक ‘दीदी बनाम ईडी’ की सियासी जंग छिड़ चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़ी संस्था आई-पैक (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी ने चुनावी माहौल में नई चिंगारी सुलगा दी है। बंगाल के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि चुनाव से पहले यहां कोई न कोई बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम जरूर सामने आता रहा है।
साल 2016 में नारद स्टिंग, 2021 के चुनाव से पहले कोयला और मवेशी तस्करी के मामले और अब 2026 के चुनावी मुहाने पर आई-पैक प्रकरण ने सियासी बिसात बिछा दी है। मौजूदा घटनाक्रम को इसलिए भी असाधारण माना जा रहा है, क्योंकि यह शायद पहला मौका है जब किसी राज्य की मुख्यमंत्री स्वयं ईडी की कार्रवाई के दौरान मौके पर पहुंची हों।
कोलकाता के लाउड स्ट्रीट में आई-पैक के सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास और साल्टलेक स्थित कार्यालय में जब ईडी दस्तावेजों की जांच कर रही थी, उसी दौरान ममता बनर्जी का वहां पहुंचना, फिर लैपटॉप और ‘ग्रीन फाइल’ के साथ बाहर निकलना किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं था। करीब छह घंटे चले इस पूरे घटनाक्रम ने जांच एजेंसी को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया और केंद्र-राज्य टकराव को नए स्तर पर पहुंचा दिया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का स्पष्ट कहना है कि यह कार्रवाई उनकी पार्टी की गोपनीय चुनावी रणनीति पर हमला है। उनका आरोप है कि भाजपा, ईडी के जरिए तृणमूल की 2026 की चुनावी योजना को निशाना बना रही है। इसी के तहत कोलकाता में उनका पैदल मार्च और दिल्ली में तृणमूल सांसदों का प्रदर्शन देखने को मिला।
वहीं भाजपा इस पूरे मामले को अलग नजरिये से देख रही है। भाजपा का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने एक निजी कंसल्टेंसी फर्म को बचाने के लिए कानून हाथ में लिया और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की। भाजपा सांसद संबित पात्रा के तीखे बयान से साफ है कि पार्टी इस मुद्दे को ‘भ्रष्टाचार और अराजकता’ के फ्रेम में लेकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है।
कानूनी मोर्चे पर यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। ईडी ने अनुच्छेद 32 के तहत सीधे शीर्ष अदालत का रुख किया है। एजेंसी का आरोप है कि कोयला तस्करी से जुड़े करीब 20 करोड़ रुपये हवाला के जरिए आई-पैक तक पहुंचे, जिनका इस्तेमाल 2022 के गोवा चुनाव में किया गया।
ईडी का यह भी दावा है कि राज्य सरकार की मशीनरी ने जांच में बाधा डाली। इसके जवाब में बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर अपना पक्ष सुने जाने की मांग की है। उधर ममता बनर्जी की शिकायत पर कोलकाता और विधाननगर पुलिस ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ ‘डाटा चोरी’ का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पूरे प्रकरण ने एक संवैधानिक गतिरोध की स्थिति पैदा कर दी है, जहां एक ओर केंद्रीय जांच एजेंसी है तो दूसरी ओर राज्य की पुलिस और सरकार। सियासी हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस टकराव से चुनावी लाभ किसे होगा।
इस मुद्दे पर भाजपा और माकपा जैसी वैचारिक रूप से विरोधी पार्टियां भी एक सुर में सवाल उठा रही हैं। माकपा के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम का यह कहना कि “एक निजी कंपनी के लिए मुख्यमंत्री का सड़कों पर उतरना कितना उचित है”, ममता बनर्जी की छवि पर सीधा प्रहार है।
हालांकि ममता बनर्जी भी राजनीतिक दांव-पेंच की अनुभवी खिलाड़ी हैं। वे पहले भी खुद पर हुए हमलों को ‘बंगाल की बेटी’ और बंगाली अस्मिता से जोड़कर जनसमर्थन जुटाती रही हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘ग्रीन फाइल’ की यह लड़ाई 2026 के चुनावी रण में किसके पक्ष में जाती है।



