संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह )
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 को सरकार ने “विकास, सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में बड़ा कदम बताया है। दवाओं के निर्यात–आयात को बढ़ावा, रक्षा क्षेत्र में भारी निवेश, रेलवे विस्तार, बुनियादी ढांचे के लिए नई योजनाएँ और उद्योगों के लिए प्रोत्साहन—ये सभी घोषणाएँ देश के आर्थिक नक्शे को मजबूत करने वाली प्रतीत होती हैं। लेकिन जब इस बजट को सीमांचल और कोसी क्षेत्र की दृष्टि से देखा जाता है, तो विकास का यह दावा अधूरा और असंतुलित नजर आता है।
पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा—ये जिले न केवल बिहार के अंतिम छोर पर स्थित हैं, बल्कि लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से भी दूर रखे गए हैं। बजट भाषण में जब देश के कई क्षेत्रों के लिए विशेष परियोजनाओं, रेलवे कॉरिडोर, औद्योगिक क्लस्टर और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की चर्चा हुई, तब सीमांचल के लिए कोई ठोस घोषणा दिखाई नहीं दी। न कोई बड़ी रेल परियोजना, न कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय या मेडिकल हब, न कोई विशेष आर्थिक पैकेज—मानो यह क्षेत्र नीति निर्माताओं की प्राथमिकताओं में कहीं दर्ज ही नहीं।
यह पहली बार नहीं है जब सीमांचल को नजरअंदाज किया गया हो। चुनावी मंचों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य शीर्ष नेताओं ने बिहार, विशेषकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र के विकास को लेकर अनेक वादे किए थे। रोजगार, उद्योग, रेलवे विस्तार, बाढ़ नियंत्रण, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव के सपने दिखाए गए थे। लेकिन चुनावी जीत के बाद उन घोषणाओं का अधिकांश हिस्सा फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह गया।
सीमांचल आज भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है—हर साल बाढ़ और कटाव, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा संस्थानों का अभाव और कमजोर परिवहन व्यवस्था। यदि सरकार सचमुच “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर चलती, तो इस क्षेत्र के लिए विशेष विकास पैकेज की घोषणा अनिवार्य थी। लेकिन बजट 2026-27 में इस इलाके के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिखता। सीमांचल के लिए यह भी एक कटु सत्य बन चुका है कि यहाँ विकास कभी सहज रूप से नहीं आता। पूर्णिया और आसपास के जिलों के लोगों की नियति मानो यही बन गई है कि जो भी अधिकार या सुविधा मिलेगी, वह संघर्ष के बाद ही मिलेगी। एयरपोर्ट, मेडिकल कॉलेज, रेलवे विस्तार, सड़क परियोजनाएँ—हर बड़ी योजना के लिए यहाँ के समाज को आंदोलन करना पड़ा, ज्ञापन देना पड़ा, सड़कों पर उतरना पड़ा। विकास यहाँ सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि जनता के दबाव से मिलता रहा है।
एम्स जैसी संस्थान की घोषणा हुई थी, लेकिन वह साकार नहीं हो सकी। मेडिकल कॉलेज की स्थापना भी लंबी लड़ाई के बाद संभव हुई। रेलवे लाइन का विस्तार आज भी अधूरा सपना है, जबकि यह क्षेत्र व्यापार, कृषि और आवागमन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लगता है कि आने वाले समय में भी यदि पूर्णिया और सीमांचल को अपना हक चाहिए, तो समाज को फिर संगठित होकर आवाज उठानी पड़ेगी, आंदोलन करना पड़ेगा और सरकार को याद दिलाना पड़ेगा कि विकास केवल राजधानी और महानगरों का अधिकार नहीं, बल्कि देश के अंतिम छोर पर बसे नागरिकों का भी मूल अधिकार है।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस क्षेत्र ने देश को श्रम, कृषि और संसाधन दिए, उसे अपने भविष्य के निर्माण के लिए बार-बार सड़क पर उतरना पड़ता है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो सीमांचल का विकास सरकार की नीति नहीं, बल्कि जनता के संघर्ष का परिणाम बनकर रह जाएगा—और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
आज आवश्यकता है कि सरकार केवल बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित विकास नीति से बाहर निकलकर सीमांचल जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष रणनीति बनाए। पूर्णिया और आसपास के जिलों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रेलवे, उद्योग और कृषि आधारित विकास का केंद्र बनाया जाए। जब तक विकास की रोशनी देश के अंतिम छोर तक नहीं पहुंचेगी, तब तक बजट के आंकड़े और भाषण आम जनता के लिए खोखले ही रहेंगे। सीमांचल आज भी इंतजार में है—उस दिन का, जब बजट के पन्नों में उसका नाम केवल औपचारिक नहीं, बल्कि वास्तविक विकास की योजना के रूप में दर्ज होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह क्षेत्र हर बजट के बाद यही कहता रहेगा—हम फिर ठगे गए।



