


संपादकीय, Editorial: ( रीना एन सिंह) फरवरी 2026 में बिहार विधानसभा में पेश बजट 2026-27 को सरकार ने ‘ज्ञान, विज्ञान और आर्मान’ का दस्तावेज बताया है। 3.47 लाख करोड़ रुपये का यह बजट पिछले वर्ष से काफी बड़ा है और रोजगार दोगुना करने, आय दोगुनी करने, महिलाओं-युवाओं-किसानों के लिए योजनाओं, सामाजिक कल्याण पर 7,724 करोड़ […]

संपादकीय, Editorial: ( रीना एन सिंह) न्याय का भविष्य पुलिस की वास्तविक, संरचनात्मक और संस्थागत स्वतंत्रता से गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि जब तक पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और स्वार्थपूर्ण दबावों से मुक्त नहीं होगी, तब तक आम नागरिक के लिए सुरक्षा, समानता और न्याय केवल संविधान की पुस्तकों में दर्ज आदर्श बनकर रह […]

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह ) भारत के संविधान लागू होने के 75 वर्ष बाद राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक वंदे मातरम् को स्पष्ट प्रोटोकॉल के साथ पुनः प्रतिष्ठित किया जाना एक ऐतिहासिक क्षण है। भारत के गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी 2026 को जारी सर्कुलर ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी कार्यक्रमों, विद्यालयों और औपचारिक […]

संपादकीय, Editorial: ( श्रेया सिंह ) करियों में आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत आर्थिक श्रेणी का उपवर्ग बनाने एवं चयन प्रक्रिया में उसको प्राथमिकता दिए जाने हेतु सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह की जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत और जांयमाल्या बागची की पीठ ने […]

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह ) आज पूरी पृथ्वी युद्ध की गर्माहट महसूस कर रही है। हर दिशा में संघर्ष, शोर और विनाश का दृश्य है। शक्तिशाली देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने-अपने राष्ट्रहित की परिभाषा गढ़ रहे हैं, और उसी सोच के आधार पर तय हो रहा है कि किस देश को कितनी ताकत […]

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह ) पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतंत्र, संविधान और कानून के बीच चल रही एक गहरी वैचारिक लड़ाई का रूप ले चुकी है। बांग्लादेशी घुसपैठ, प्रशासनिक पक्षपात, SIR प्रक्रिया का विरोध, CBI और ED की कार्रवाइयों पर सवाल, […]

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह ) राजनीति, सत्ता और सामाजिक रिश्ते अक्सर तब तक नैतिकता का मुखौटा ओढ़े रहते हैं, जब तक व्यक्तिगत स्वार्थ और शक्ति की भूख अपनी पराकाष्ठा तक नहीं पहुँच जाती। जब सत्ता स्वाद की पूर्ति करने लगती है, तब नैतिकता, संवेदना और संविधान—तीनों को किनारे रख दिया जाता है। आज बिहार […]

