बंगाल में भय, दबाव और धमकी की विसात पर भाजपा की राजनीतिक गेंदबाजी

संपादकीय, Editorial:                                                                                                                              ( नंदकिशोर सिंह  )

 

पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक से केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं रही, बल्कि यह भय, हिंसा और सत्ता के गठजोड़ का प्रतीक बनती चली गई है। तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाओं में जिस तरह वृद्धि हुई है, उसने पूरे देश को चिंतित किया है। विपक्षी दलों, मानवाधिकार संगठनों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पिछले वर्षों में सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या, हजारों पर हमले और व्यापक स्तर पर धमकी की घटनाएँ सामने आई हैं। पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक, बंगाल में लोकतंत्र बार-बार हिंसा के साये में खड़ा नजर आया है।

बंगाल में यह धारणा गहराती गई है कि जो व्यक्ति तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खड़ा होता है, उसे राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक दबाव झेलना पड़ता है। विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान डर, धमकी और हिंसा के जरिए मतदाताओं को प्रभावित किया जाता रहा है। सत्ता पक्ष इन आरोपों को नकारता रहा है, लेकिन बार-बार सामने आने वाली घटनाएँ यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या बंगाल में लोकतंत्र वास्तव में स्वतंत्र है? इसी संदर्भ में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची की सघन जांच और पुनरीक्षण की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। फर्जी, मृत और दोहरी प्रविष्टियों को हटाने का प्रयास लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में कदम है। लेकिन सत्ता पक्ष की बेचैनी यह संकेत देती है कि बंगाल में चुनाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन का निर्णायक युद्ध बन चुका है।

बंगाल भाजपा के अध्यक्ष सुवेंदु अधिकारी लगातार ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वे बार-बार आरोप लगाते रहे हैं कि बंगाल में विपक्ष के लिए राजनीतिक माहौल असुरक्षित हो चुका है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा संगठनात्मक स्तर पर मजबूत होने की कोशिश कर रही है और दावा कर रही है कि यदि चुनाव भयमुक्त और निष्पक्ष हुए, तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन संभव है। इस संघर्ष की सबसे जीवंत तस्वीर युवा भाजपा नेता राकेश सिंह की राजनीतिक यात्रा में दिखाई देती है। विपक्षी राजनीति में सक्रिय रहने के कारण उन पर अनेक मुकदमे दर्ज किए गए, उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और लगातार प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ा। उनके समर्थकों का कहना है कि उन पर दर्ज मामलों में से कई को अदालतों ने कमजोर या निराधार पाया, जिससे उन्हें बार-बार राहत मिली।

राकेश सिंह की लड़ाई बंगाल की उस राजनीति का प्रतीक बन गई है, जिसमें सत्ता के खिलाफ खड़ा होना व्यक्तिगत जोखिम बन जाता है। राकेश सिंह जैसे युवा नेताओं की सक्रियता यह संकेत देती है कि बंगाल में राजनीतिक प्रतिरोध केवल संगठनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले रहा है। उनके खिलाफ कथित दबाव, धमकियों और मुकदमों के बावजूद उनका संघर्ष जारी रहना यह दर्शाता है कि बंगाल की राजनीति अब केवल सत्ता की नहीं, बल्कि साहस और अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाला भारत आज बंगाल के प्रश्न पर असहज दिखाई देता है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव इतना तीखा हो चुका है कि लोकतंत्र का मूल उद्देश्य पीछे छूटता नजर आता है।

सवाल यह है कि यदि बंगाल में कानून का शासन पूरी तरह स्थापित नहीं हो पा रहा, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है—राज्य सरकार की, केंद्र की या पूरे राजनीतिक तंत्र की? अंततः बंगाल की लड़ाई केवल तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा की नहीं है। यह लड़ाई है—भय बनाम लोकतंत्र, हिंसा बनाम संविधान और सत्ता बनाम जनता की इच्छा की। यदि बंगाल में चुनाव वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष हुए, तो यह न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए निर्णायक क्षण साबित होगा। और यदि भय की राजनीति जारी रही, तो यह लोकतंत्र के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी होगी। वास्तव में भाई दबाव और धमकी की विशाल जो तीन मूल कांग्रेस ने बिछा रखी है उसे पर भाजपा जैसी बड़ी पार्टी का राजनीतिक गेंदबाजी कितना चल पाएगा यह 2026 का चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा।

Share This Article
अंग इंडिया न्यूज़ एक समर्पित डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है जो भारत की सांस्कृतिक गहराइयों, सामाजिक मुद्दों और जन-आवाज को निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। हमारा उद्देश्य है—हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर भाषा को प्रतिनिधित्व देना, ताकि खबरें सिर्फ सूचनाएं न रहें, बल्कि बदलाव की प्रेरणा बनें।हम न सिर्फ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं, बल्कि उन कहानियों को भी उजागर करते हैं जो आमतौर पर मुख्यधारा से दूर रह जाती हैं। अंग इंडिया न्यूज़ का हर लेख, हर रिपोर्ट और हर विश्लेषण एक सोच के साथ लिखा जाता है—"जनता की नज़र से, जनता के लिए।"
- Advertisement -

आपके लिए ख़ास ख़बर

App Icon