महाराष्ट्र: अजित पवार के आकस्मिक निधन से महाराष्ट्र की राजनीति एक गहरे भावनात्मक दौर में चली गई थी, जहां परिवार, समर्थक और कार्यकर्ता शोक में डूबे हुए थे, लेकिन इसी खामोशी के भीतर सत्ता की राजनीति पूरी तेजी से आगे बढ़ रही थी और ऐसे फैसले लिए जा रहे थे, जिन्होंने आने वाले राजनीतिक समीकरणों की दिशा तय कर दी। अजित पवार के जाने के बाद शुरुआती घंटों में एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की चर्चाएं तेज हो गई थीं और एनसीपी (शरद पवार) गुट के कई वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि यह सिर्फ अटकलें नहीं थीं, बल्कि महीनों से इस पर बातचीत चल रही थी और इसे औपचारिक रूप दिया जाना बाकी था।
यहां तक कहा गया कि अजित पवार की भी यही इच्छा थी कि पार्टी एकजुट हो और शरद पवार के जन्मदिन तक इसका ऐलान किया जाए। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, मुंबई के राजनीतिक गलियारों में तस्वीर बदलने लगी। अजित पवार गुट के प्रमुख नेताओं ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बैठक कर विधायक दल के नेतृत्व और खाली पड़े उपमुख्यमंत्री पद पर चर्चा शुरू कर दी, जहां सत्ता में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने को प्राथमिकता दी गई। इसी बैठक में पहली बार सुनेत्रा पवार के नाम पर सहमति बनती दिखी और इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर इस फैसले को आगे बढ़ाया गया।
यह पूरा घटनाक्रम उस समय हो रहा था, जब पवार परिवार शोक की प्रक्रिया से गुजर रहा था और शरद पवार तथा एनसीपी (SP) नेतृत्व को इन राजनीतिक फैसलों की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि संभावित पार्टी विलय की राह से राजनीति हटकर सीधे सत्ता के गणित पर आ गई है और भावनाओं पर राजनीतिक मजबूरी और शक्ति संतुलन भारी पड़ गया है। सुनेत्रा पवार के डिप्टी सीएम पद की ओर बढ़ने की यह कहानी सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस बदलाव का संकेत है जहां पवार परिवार, पार्टी और सत्ता तीनों के रास्ते अब एक नहीं रहे और महाराष्ट्र की राजनीति एक नए, कहीं अधिक जटिल दौर में प्रवेश कर चुकी है।



