सीमांचल में बाल श्रम, तस्करी और बाल विवाह का काला साया – गरीबी और जागरूकता की कमी से बरकरार भयावह हकीकत

पूर्णिया : नेपाल और बांग्लादेश सीमा से सटे बिहार के सीमांचल क्षेत्र—पूर्णिया, कटिहार, अररिया व किशनगंज—में गरीबी, अशिक्षा व जागरूकता के अभाव ने बच्चों व नाबालिग लड़कियों के लिए नई दासता की कहानी रच दी है, जहां बाल श्रम, मानव तस्करी व देह व्यापार की घटनाएं आम हो चुकी हैं; सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन चार जिलों से प्रतिमाह औसतन 20 बच्चों को श्रमिक ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त कराया जा रहा है, जबकि मखाना प्रसंस्करण जैसे पारंपरिक कार्यों में गरीबी के कारण अभिभावक अपने बच्चों को प्रतिष्ठानों पर गिरवी रख देते हैं, जो श्रम विभाग की सतर्कता के बावजूद जारी है। भूमिका विहार एनजीओ की निदेशक शिल्पी सिंह बताती हैं कि इंटरनेट व सोशल मीडिया के जरिए प्रेम जाल बुनकर या छद्म शादी के बहाने नाबालिग लड़कियों को देह मंडियों में धकेला जा रहा है, और उनके संगठन ने सीमांचल से 275 महिलाओं व लड़कियों को तस्करी के जाल से बचाया है l

जिसमें पूर्णिया की दो मंडियों से चंद माह पूर्व 15 नाबालिगों की रेस्क्यू शामिल है। एनएफएचएस-5 सर्वे के मुताबिक, अररिया व कटिहार जैसे जिलों में बाल विवाह की दर 40% से ऊपर है, जो विवशता व सांस्कृतिक दबाव से प्रेरित है, हालांकि यूनिसेफ व स्थानीय एनजीओ संयुक्त प्रयासों से जागरूकता अभियान चला रहे हैं, लेकिन सीमावर्ती इलाके की भौगोलिक चुनौतियां व बाढ़ जैसी आपदाएं समस्या को और गहरा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सतत शिक्षा, कौशल विकास व कड़े कानूनी प्रवर्तन से ही इस चक्र को तोड़ा जा सकता है, वरना सीमांचल के लाखों बच्चे शोषण की भेंट चढ़ते रहेंगे।

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