पूर्णियाँ विश्वविद्यालय में हिंदी की हुंकार, सोशल मीडिया से वैश्विक मंच तक विस्तार पर मंथन

सोशल मीडिया ने हिंदी भाषा को दिया नया विस्तार : वक्ता

पूर्णियाँ / किशन : हिंदी दिवस के अवसर पर पूर्णियाँ विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में सोमवार को ‘सोशल मीडिया और हिंदी’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में विभाग के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप, सोशल मीडिया में उसके बढ़ते प्रभाव तथा वैश्विक स्तर पर हिंदी की बढ़ती स्वीकार्यता पर अपने विचार व्यक्त किए।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. जितेश कुमार ने कहा कि वर्तमान दौर में हिंदी भाषा का एक नया स्वरूप उभरकर सामने आ रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी की एक नई शब्दावली विकसित हो रही है, जिसे नई पीढ़ी सहजता से स्वीकार कर रही है।

उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, भावनाओं और सपनों से जुड़ी भाषा है। यह हमारे विचारों को अभिव्यक्ति देने के साथ-साथ सपनों को साकार करने की प्रेरणा भी देती है। विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कुलभूषण मौर्य ने कहा कि हिंदी की उत्पत्ति सौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है। इसके नामकरण का संबंध सिंधु नदी और ईरानी उच्चारण परंपरा से जोड़ा जाता है। लगभग एक हजार वर्ष पुरानी हिंदी आज आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित हो रही है। शोध एवं अध्ययन के क्षेत्र में हिंदी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी ने विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर अपने शब्द-भंडार को समृद्ध किया है। सोशल मीडिया ने हिंदी के विस्तार और प्रयोग को नई गति प्रदान की है। सहायक प्राध्यापक डॉ. अनामिका सिंह ने कहा कि हिंदी भाषा में भावों और विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने की अपार क्षमता है। यही कारण है कि हिंदी क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक भाषा के रूप में अपनी पहचान बना रही है।

उन्होंने कहा कि हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता उसके समृद्ध शब्द-भंडार और व्यापक प्रयोग का प्रमाण है। तकनीकी एवं आधुनिक शब्दों के समावेश से हिंदी का स्वरूप और अधिक विस्तृत हो रहा है।विभाग के विद्यार्थियों ने कहा कि हिंदी को भारत की सीमाओं से बाहर लोकप्रिय बनाने में साहित्य, अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ भारतीय सिनेमा और हिंदी गीतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी फिल्मों और गीतों ने देश-विदेश में हिंदी के प्रति आकर्षण बढ़ाया है। विभिन्न देशों में हिंदी के अध्ययन को प्रोत्साहन मिल रहा है तथा अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों के माध्यम से भी हिंदी का व्यापक प्रसार हो रहा है। शोधार्थी मनोज कुमार ने कहा कि हिंदी के वैश्विक विस्तार के अनेक उदाहरण सामने हैं। हाल के वर्षों में विश्व समुदाय में हिंदी के प्रति बढ़ती रुचि इसकी लोकप्रियता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि हिंदी की सरलता, सहजता और अभिव्यक्ति की क्षमता इसे सीखने के लिए आकर्षक बनाती है। विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन इसकी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का प्रमाण है। विभाग की छात्रा पूजा कुमारी ने कहा कि इंटरनेट पर तेजी से उभरने वाली भाषाओं में हिंदी प्रमुख है। फिल्मों के अतिरिक्त इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हिंदी को व्यापक मंच प्रदान किया है। इन माध्यमों के कारण हिंदी का प्रयोग नई पीढ़ी के बीच लगातार बढ़ रहा है। जया दास ने कहा कि हिंदी को लेकर समय-समय पर विभिन्न प्रकार की चर्चाएँ और विवाद सामने आते रहे हैं, लेकिन इनसे हिंदी की विकास-यात्रा प्रभावित नहीं हुई है। हिंदी आज मातृभाषा और लोकभाषा के साथ-साथ जनसंचार की महत्वपूर्ण भाषा बन चुकी है।

उन्होंने कहा कि हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है और वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है।अभिलाषा ने कहा कि हिंदी दुलार, सहयोग और प्रेम की भाषा है। यह भारतीय जनमानस की भावनाओं और संवेदनाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। हिंदी के प्रति सम्मान और गौरव की भावना प्रत्येक भारतीय के मन में विद्यमान है।पूजा, विभा एवं ज्योति ने संयुक्त रूप से कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी ने देशवासियों को एक सूत्र में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हिंदी का साहित्य इसकी समृद्धि का प्रमुख आधार है। आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल के साहित्य ने हिंदी को व्यापक वैचारिक एवं रचनात्मक आधार प्रदान किया है। हिंदी साहित्य की विविधता और समृद्धि इसे विश्व की प्रमुख साहित्यिक भाषाओं में स्थान दिलाती है।संगोष्ठी के समापन अवसर पर वक्ताओं ने हिंदी के प्रति सम्मान, समर्पण और निरंतर प्रयोग का संकल्प व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक विरासत के रूप में देखना चाहिए। विद्यार्थियों से आह्वान किया गया कि वे अन्य भाषाओं का अध्ययन अवश्य करें, लेकिन हिंदी के प्रयोग और विकास के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाएँ। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी लिखने-बोलने में किसी प्रकार की झिझक नहीं होनी चाहिए। हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को स्वयं को कमजोर नहीं समझना चाहिए, बल्कि अपनी भाषा पर गर्व करते हुए ज्ञान और कौशल के विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग और प्रचार-प्रसार ही हिंदी दिवस की सार्थकता है।