सहरसा, अजय कुमार : राज्य के मैथिली अकादमी में ताला लग गया है।जिसके कारण मैथिल भाषियों में बेहद आक्रोश व्याप्त है।इस संबंध में मैथिली अभियानी संस्था संस्कृति मिथिला के अध्यक्ष रामकुमार सिंह व उपाध्यक्ष पंडित तरुण झा नें बताया कि उच्च शिक्षा विभाग के अधीन चल रही भाषायी अकादमियों में एकमात्र मैथिली अकादमी है।जिसकी नौ पुस्तकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका हैं। वही अकादमी द्वारा प्रकाशित 213 पुस्तकों में ज्यादातर राज्य के विश्वविद्यालयों के स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल हैं। इनमें ऐसी पुस्तकें हैं।जो पीएचडी करने वाले शोधार्थियों के लिए रेफरेंस बुक है।जबकि अकादमी की पुस्तकों की मांग विदेशों में भी है। इस प्रकार अनेकों उपलब्धियों के बादवजूद मैथिली अकादमी में पांच महीनों से ताला जड़ा है। इसमें ताला इसलिए लग गया, क्योंकि इसके कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति दूसरे कार्यालयों में कर दी गयी। दक्षिण भारतीय भाषा संस्थान से दो कर्मचारियों के समायोजन के बाद मैथिली अकादमी में कर्मचारियों की संख्या एक से बढ़ कर तीन हो गयी। लेकिन, समायोजित होने वाले दो कर्मचारियों में से एक कर्मचारी की एल. एन. मिश्रा इंस्टीचयूट में और दूसरे की उच्च शिक्षा निदेशालय में प्रतिनियुक्ति बावजूद, पहले से तैनात एकमात्र कर्मचारी मैथिली अकादमी चला रहे थे।
लेकिन, उस एकलौते कर्मचारी की भी गत जुलाई माह में उच्च शिक्षा निदेशालय में प्रतिनियुक्ति कर दी गयी। नतीजतन, वर्ष 1976 के फरवरी में स्थापित मैथिली अकादमी में ताला लग गया।वही मैथिली अभियानी प्रवीण नारायण चौधरी एवं अमित आंनद ने कहा कि बिहार की राजधानी पटना में बनी मैथिली अकादमी से चार साल से कोई किताब नहीं छपी और यहां कोई स्टाफ भी नहीं है जो पुरानी बेस्ट सेलर किताबें बेच सके। इन हालात में मैथिली विषय पढ़ने वाले हजारों छात्र परेशान हैं।इनके अलावा मैथिली विषय से संघ लोकसेवा आयोग और बिहार लोकसेवा आयोग की परीक्षाएं देने वाले छात्रों के लिए भी पाठ्यपुस्तकें हासिल करने की इकलौती जगह यही मैथिली अकादमी है।मगर पिछले तकरीबन छह महीने से यह अकादमी लगभग बंद पड़ी है।यहां किताबें हैं,मगर इन्हें बेचने वाला कोई स्टाफ नहीं है। इस अकादमी के इकलौते स्टाफ को शिक्षा विभाग ने सचिवालय में डेपुटेशन पर भेज दिया है और विभाग के इस फैसले से मैथिली भाषा की पढ़ाई करने वाले हजारों छात्र परेशान हैं।



