पूर्णिया: देशभर में जहां स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त की सुबह औपचारिक ध्वजारोहण के साथ मनाया जाता है, वहीं बिहार के पूर्णिया शहर का झंडा चौक हर साल 14 अगस्त की मध्य रात्रि को एक अलग ही दृश्य प्रस्तुत करता है, जब हजारों की भीड़ आजादी की पहली घड़ी को जीवंत करने वहां जुटती है। 1947 में जब 14 अगस्त की रात 12 बजकर एक मिनट पर भारत के आजाद होने की घोषणा हुई थी, उसी क्षण पूर्णिया के झंडा चौक पर तिरंगा पहली बार फहराया गया था। उसी ऐतिहासिक पल की स्मृति में बीते 78 वर्षों से लगातार हर वर्ष मध्य रात्रि को झंडोत्तोलन की यह परंपरा निभाई जा रही है।
स्वतंत्रता सेनानी शमसुल हक, डॉ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु, नरेंद्र प्रसाद स्नेही जैसे राष्ट्रभक्तों की अगुवाई में यह उत्सव शुरू हुआ था, और आज भी उनके परिजनों और स्थानीय नागरिकों द्वारा पूरे गर्व और श्रद्धा से मनाया जाता है। अधिवक्ता दिलीप कुमार दीपक बताते हैं कि 1947 में जैसे ही रेडियो पर आजादी की घोषणा हुई, लोग झूम उठे और भारत माता की जय के नारों के साथ तिरंगा फहराया गया।
तब से लेकर अब तक यह समारोह हर साल उसी जोश के साथ दोहराया जाता है। स्वतंत्रता सेनानी शमसुल हक के निधन के बाद यह परंपरा उनके अनुयायियों द्वारा जारी है, जिसमें अब विपुल सिंह और समाजसेवी अनिल चौधरी जैसे लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। हजारों लोग हर साल इस आयोजन में शामिल होते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक इसे राजकीय मान्यता नहीं मिली है। इसके बावजूद, यह आयोजन हर साल राष्ट्रीय चेतना, गर्व और आजादी के गौरवशाली इतिहास की ज्वलंत मिसाल बनकर देशवासियों को प्रेरणा देता है।



