संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह )
बिहार का ताजा बजट केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि चुनाव के बाद सरकार की प्राथमिकताओं का आईना है। यह बजट उस सरकार का है, जिसने चुनाव जीत लिया है और अब अगले चार वर्षों तक राजनीतिक दबाव से लगभग मुक्त है। यही कारण है कि इस बजट में घोषणाओं की चमक तो है, लेकिन जमीन पर उतरने की गारंटी कम दिखाई देती है।
यदि चुनाव से पहले पेश किए गए 2024-25 और 2025-26 के बजटों से तुलना की जाए, तो स्पष्ट अंतर दिखता है। चुनाव पूर्व बजट में लोकलुभावन वादों की भरमार थी, जबकि चुनाव बाद बजट में सरकार का स्वर अधिक आत्मविश्वासी और कम जवाबदेह नजर आता है। अनुभव बताता है कि पहले चार वर्षों में घोषणाएं सीमित रहती हैं और पांचवें वर्ष में वादों की बाढ़ आती है।
इस बजट का कुल आकार लगभग 3 लाख 47 हजार 590 करोड़ रुपये है। सरकार के अनुसार लगभग 35 प्रतिशत राशि विकास कार्यों पर और करीब 65 प्रतिशत राशि वेतन, पेंशन और विभिन्न सरकारी भत्तों पर खर्च होगी। यह आंकड़ा स्वयं बताता है कि बिहार का बजट अब भी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में अधिक और विकासात्मक राज्य की दिशा में कम है। महिलाओं के स्वावलंबन पर सरकार का जोर निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। यह स्वीकार करना होगा कि महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बिहार ने कुछ उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। इसी प्रकार सिंगल लेन सड़कों को डबल लेन में बदलने की योजना भी दूरगामी सोच का परिचायक है। बढ़ती आबादी और यातायात के दबाव को देखते हुए यह फैसला बिहार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सरकार दावा करती है कि बिहार की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 14.9 प्रतिशत है और राज्य तेजी से विकास की ओर अग्रसर है। किसानों, उद्योग, निवेश नीति, टेक सिटी, स्वास्थ्य, शिक्षा और पलायन रोकने के लिए अनेक योजनाओं की घोषणा की गई है। यह भी सच है कि बिहार में सड़क, बिजली, भवन, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले वर्षों में कुछ प्रगति हुई है, जिससे आम जनता को राहत मिली है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास समान रूप से पूरे बिहार में पहुंच रहा है? पूर्णिया और सीमांचल जैसे क्षेत्रों के लिए यह बजट फिर निराशा लेकर आया है। केंद्र सरकार ने पूर्णिया के लिए रेलवे की कोई नई योजना नहीं दी। ग्रीनफील्ड सड़क परियोजना कागजों से आगे नहीं बढ़ी। पूर्णिया मेडिकल कॉलेज की भव्य इमारत खड़ी है, लेकिन डॉक्टरों की भारी कमी है। अस्पताल का संचालन अब भी अधूरा है। लगभग 45-50 डॉक्टरों के भरोसे इतना बड़ा मेडिकल कॉलेज चल रहा है, और कई डॉक्टर केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराते हैं। परिणामस्वरूप आम मरीज को वह सुविधा नहीं मिल पा रही, जिसका वादा किया गया था।
शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। स्कूल भवन बने, आदर्श विद्यालय बने, आंगनबाड़ी केंद्र बने — लेकिन व्यवस्था के भीतर फैला भ्रष्टाचार विकास की सबसे बड़ी बाधा बन गया है। अनाज, दाल, तेल, मसाले और अंडे की खरीद में कमीशन का ऐसा जाल बना है कि सरकारी दर और बाजार दर के बीच भारी अंतर पैदा हो गया है। परिणामस्वरूप बच्चों के हिस्से का पोषण कागजों में रह जाता है और वास्तविकता में गायब हो जाता है। यही स्थिति रजिस्ट्री कार्यालयों और प्रखंड कार्यालयों की है, जहां भ्रष्टाचार एक समानांतर व्यवस्था के रूप में स्थापित हो चुका है। आम जनता अपनी ही संपत्ति बचाने के लिए दलालों और अधिकारियों के बीच समझौता करने को मजबूर है। सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार है या नहीं, सवाल यह है कि इसे ठीक क्यों नहीं किया जा सकता?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दावा है कि किसानों, महिलाओं और उद्यमियों को मजबूत करने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं और पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 30 हजार करोड़ रुपये अधिक आवंटन किया गया है। यह बात आश्वस्त करती है, लेकिन अनुभव बताता है कि योजनाओं और वास्तविकता के बीच की दूरी अक्सर बहुत लंबी होती है।
बजट को यदि सामाजिक विकास का सामूहिक भोज माना जाए, तो सवाल यह है कि इस भोज में पूर्णिया और सीमांचल को आखिर कितनी हिस्सेदारी मिली? चुनाव से पहले किए गए हजारों वादे अब दर्जनों में सिमट गए हैं, और उन दर्जनों में भी पूर्णिया का नाम मुश्किल से दिखाई देता है। यदि सीमांचल को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा, तो विकास की बूंदें यहां केवल छींटों तक सीमित रह जाएंगी। बिहार का विकास तभी सार्थक होगा, जब उसकी रोशनी राजधानी से निकलकर सीमांचल के अंतिम गांव तक पहुंचे। चुनाव जीतना सरकार की सफलता हो सकती है, लेकिन जनता के भरोसे को जीतना ही असली चुनौती है। बजट की सफलता आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले बदलाव से तय होगी।



