PURNIA NEWS,विमल किशोर : आस्था का प्रतीक और अनुमंडल क्षेत्र का सबसे प्राचीन धार्मिक स्थल शिव दुर्गा मंदिर सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है, इसी कारण नवरात्र समेत वर्षभर दूर-दराज से श्रद्धालुओं की भीड़ यहां उमड़ती है। भक्त मन्नत पूरी होने पर छागड़ की बलि देकर मां को प्रसन्न करने की परंपरा निभाते हैं। मंदिर से जुड़ी प्राचीन किवदंतियों और इतिहास को पुजारी रामदेव गोस्वामी व बुजुर्ग मोहन झा बताते हैं कि कभी अमौरगढ़ वक्र नदी के किनारे बसा था, जो नेपाल और कोलकाता से इसे जोड़ता था। रामनगर ड्योढ़ी के राजा देवानंद और उनके वंशजों ने इस इलाके को समृद्ध बनाया। अमौरगढ़ में चौड़ी सड़कों, तालाबों और गुप्त सुरंगों का निर्माण हुआ। रानी इसी सुरंग से होकर मंदिर में पूजा-अर्चना करने पहुंचती थीं।
राजा तीर्थानंद के काल में पहली बार यहां मिट्टी की मूर्ति बनाकर मां दुर्गा की आराधना शुरू हुई। राजाओं के संरक्षण में अमौर न सिर्फ धार्मिक बल्कि एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र भी बना। खास बात यह भी रही कि राजाओं ने हिंदू धर्मस्थल के साथ-साथ मुसलमानों के लिए पीर बाबा का मजार भी बनवाया, जो आज भी यहां विद्यमान है। राजसत्ता खत्म होने के बाद मंदिर और मजार की देखरेख का जिम्मा सरकारी स्तर पर पुलिस प्रशासन को सौंपा गया। नवरात्र के दौरान यहां विशेष आयोजन होते हैं। मान्यता है कि नवमी के दिन मां का दर्शन कर भक्त मुरही, घुघनी और जलेबी खाकर व्रत का समापन करते हैं। मां दुर्गा को छागड़ की बलि देने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। मंदिर प्रांगण में लगने वाला मेला मां काली की प्रतिमा विसर्जन के बाद ही समाप्त होता है।



