हिन्दी मैथिली के महान साहित्यकार व रचनाकार थे राजकमल चौधरी

सहरसा, अजय कुमार : मैथिली एवं हिंदी साहित्याकाश के ध्रुव तारा जिले के महिषी निवासी स्व राजकमल चौधरी अद्भुत प्रकाण्ड विद्वान थें।उनके लेखन ने असंख्य लोगों को जीवन जीने की कला सिखाई।जिन्होंने अपने अल्प आयु में गद्य एवं पद की परंपरा को समान रूप से अपनी रचनाओं में जगह दी। उन्होंने पचास एवं साठ के दशक में विभिन्न विषयों पर अपनी रचनाओं से जो लकीर खींची उसे बड़ा कर पाना आज भी साहित्यकारों के लिए कठिन चुनौती बनी हुई है। उनके प्रखर आलोचक भी उनके निधन पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की काफी सराहना की।राजकमल की रचना ने पीढ़ियो को प्रेरित किया तथा इनकी रचनावली का प्रकाशन हिन्दी साहित्य जगत को आगे बढ़ाने में बहुमूल्य योगदान दिया। राजकमल चौधरी विद्रोही व्यक्ति थे जो उनकी रचना में स्पष्ट झलकता है। उनकी कविता में उन्होंने दुर्लभ प्रयोग किया।

राजकमल चौधरी मात्र 38 वर्ष की आयु में उपन्यास, कहानी, कविता में विपुल कृतियां रची और हर कृति अपने समय से आगे विशिष्ट और मौलिक थी। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हमारे अर्थतंत्र और परमिट राज में व्याप्त भ्रष्टाचार व अनाचार को पहचाना। राजकमल चौधरी ने पूरी जिंदगी लोभ, लाभ व कामना की पूर्ति हेतु सत्ता से समझौता नहीं किया। राजकमल चौधरी का जन्म उनके ननिहाल रामपुर हवेली में 13 दिसंबर 1929 को हुआ। उनका पैतृक गांव सहरसा के महिषी में है। उनकी कृतियां-मछली मरी हुई, नदी बहती थी, ताश के पत्तों का शहर, अग्निस्नान, बीस रानियों के बाईस्कोप, देहगाथा, एक अनार एक बीमार, आंदोलन, पाथर फूल, कंकावती, मुक्ति प्रसंग, स्वरगंधा, ऑडिट रिपोर्ट सहित अन्य रचना आज भी प्रासंगिक व समीचीन है।

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