SAHARSA NEWS,अजय कुमार : साहित्यिक आसमान के चमकते सितारे की तरह साहित्यकार राजकमल चौधरी देहावसान के बाबजूद महिषी के कपाल सदैव जीवंत है।जिसके लिए साहित्य जगत उन्हें निरन्तर स्मरण करता है और रहेगा।आधुनिक हिन्दी साहित्य के कालजयी रचनाकार राजकमल चौधरी की 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में लिखित मछली मरी हुई का अंग्रेजी अनुवाद द डेड फिश के रूप में लेखिका व अनुवादक हैदराबाद में रहने वाली महुआ सेन के द्वारा रूपा प्रकाशन नोएडा से प्रकाशित हुई है।हाई टेक सिटी हैदराबाद की मशहूर द लॉफ्ट सोशल गैदरिंग सेंटर में हैदराबाद की अनेकों अंग्रेजी साहित्य अनुरागियों के बीच अनुवादिका महुआ ने राजकमल चौधरी की यौन सम्बन्धों के केंद्र में रख कर लिखी इस उपन्यास की विशेषता को बताया।
महिषी में 1929 में जन्में राजकमल चौधरी मैथिली और हिन्दी भाषा और साहित्य में समान रूप से लिखा और अपनी अल्पायु 37 वर्ष तक दर्जनों रचना की है। जिनमें हिन्दी में मछली मरी हुई, नदी बहती थी, शहर था शहर नहीं था और मैथिली में ललका पाग, एक्टा विषधर एक्टा चंपाकली, सांझ गाछ, आंदोलन आदि प्रसिद्ध है।अंग्रेजी में महुआ सेन के द्वारा राजकमल चौधरी की मछली मरी हुई का अनुवाद प्रकाशन पर उनके एकमात्र पुत्र नीलमाधव चौधरी, जेएनयू के प्रोफेसर देवशंकर नवीन, कवि और अनुवादक दीपक के चौधरी, पत्रकार और लेखक पुष्यमित्र, ऋषिकेश प्रवास करने वाले अमित आनन्द शोधार्थी दीपक कुमार ने प्रसन्नता व्यक्त किया है और कहा है कि अंग्रेजी अनुवाद से राजकमल चौधरी की लेखन से अन्य भाषा के लोगों को भी पता चलेगा।



