पूर्णियां, आनंद यादुका: पूर्णिया जिले के भवानीपुर प्रखंड अंतर्गत सुपौली पंचायत स्थित भगवती मंदिर न सिर्फ इस इलाके का धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह बिहार के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में भी गिना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना लगभग दो सौ वर्ष पूर्व हुई थी और तभी से यहां माता भगवती की पूजा अर्चना अत्यंत भव्य रूप से होती आ रही है। यहां की एक खास बात यह है कि इस मंदिर और पंचायत का गहरा संबंध है — मान्यता है कि माता भगवती के नाम पर ही इस पंचायत का नाम ‘सुपौली’ रखा गया। आज भी यहां की धार्मिक परंपराएं, रीति-रिवाज और पूजा व्यवस्था उसी भाव से निभाई जाती हैं, जिस भाव से इसकी नींव रखी गई थी।
मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, दो सदियों पहले जब यह क्षेत्र घने जंगलों से ढका हुआ था, तब एक ब्रह्मज्ञानी रीतलाल ठाकुर को माता भगवती ने स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि वे इसी जंगल में पिंडी रूप में विद्यमान हैं। माता ने ठाकुर को आदेश दिया कि उन्हें खोजकर स्थापित किया जाए ताकि उनकी विधिवत पूजा हो सके। अगले ही दिन रीतलाल ठाकुर ने यह बात स्थानीय ग्रामीणों और उस समय के प्रसिद्ध जमींदार ब्रह्मज्ञानी स्टेट के मालिक बबुजन मंडल को बताई। बबुजन मंडल ने ग्रामीणों और अपने सिपाहियों के साथ उस घने जंगल में माता को खोजा और आखिरकार वहां एक स्थान पर पिंडी रूप में भगवती की मूर्ति प्राप्त हुई। उसी स्थान पर एक झोपड़ी बनाकर रीतलाल ठाकुर को माता की सेवा और पूजा का कार्य सौंपा गया। समय के साथ इस स्थान पर आम जनता के सहयोग से एक भव्य और आकर्षक मंदिर का निर्माण हुआ, जो आज भी श्रद्धा और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। वर्तमान में भी पूजा-पाठ की सारी जिम्मेदारियां ठाकुर परिवार की अगली पीढ़ियां ही निभा रही हैं।
यह मंदिर वर्षभर श्रद्धालुओं से गुलजार रहता है, लेकिन सबसे अधिक भीड़ हर वर्ष दशहरे के मौके पर लगने वाले विशाल मेले में देखी जाती है। दूर-दराज से लाखों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन व मन्नतें मांगने यहां आते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी कामना लेकर यहां आता है, माता उसकी सभी इच्छाएं अवश्य पूर्ण करती हैं। दशहरा मेले के दौरान यहां परंपरागत रूप से बलि प्रथा का भी आयोजन होता है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, पिछले वर्ष दशहरे पर लगभग 400 छागरों की बलि दी गई थी, वहीं पांच भैंसों के केवल कान काटकर प्रतीकात्मक बलि दी गई थी। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और भक्तगण इसे अपनी श्रद्धा और आस्था का प्रतीक मानते हैं।



