सुरेंद्र सिंह ग्रुप ने बेटी की शादी के लिए रखे पैसे ठगे, फरार रहकर पीड़ित लड़की और मां को धमकी भी दे रहा

“घर बैठे बेल और खुलेआम धमकियां”: मालती देवी की बेटी शिम्पी बोलीं — “चार साल से ठगी और डर के साए में जी रहे हैं हम”

पूर्णिया: पूर्णिया जिले के मरंगा गांव की निवासी मालती देवी और उनकी बेटी ममता कुमारी उर्फ शिम्पी एक ऐसी मार्मिक कहानी की जीती-जागती मिसाल हैं, जो बिहार के गांवों में बढ़ते हुए जमीन फर्जीवाड़े और कमजोरों के साथ न्यायिक लुटेरेपन की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। चार साल पहले इस परिवार ने पड़ोसी सुरेंद्र प्रताप सिंह पर भरोसा करते हुए ₹55 लाख की रकम सौंप दी — ₹45 लाख नकद और ₹10 लाख बैंक ट्रांसफर के जरिए। यह राशि एक जमीन के बदले में दी गई थी, ताकि परिवार को आर्थिक सुरक्षा मिल सके, लेकिन भरोसे की इस नींव पर धोखा पनपा। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने सिर्फ एक एग्रीमेंट तो बनाया, रजिस्ट्री कराने के वादे किए, लेकिन जैसे ही वक्त आया, उसने टालमटोल करना शुरू कर दिया और जमीन के बजाय खोखली उम्मीदें थमाईं। जब मालती देवी ने इस मामले को लेकर आवाज उठाई, तो उन्होंने FIR दर्ज करवाई, लेकिन न्यायालयों, थानों और अधिकारियों के चक्कर काटते हुए उनके सपनों का कोई अंत नहीं दिखा।

मालती देवी की बेटी शिम्पी ने पत्रकारों से कहा कि उन्होंने SP, DSP, कोर्ट-कचहरी हर जगह न्याय के लिए गुहार लगाई, लेकिन आरोपी सुरेंद्र प्रताप सिंह को कोई फिक्र नहीं। वह आज भी फरार है, उसे बेल मिल चुकी है और वह अपने दबंगाना रवैये से खुलेआम धमकियां देता है। शिम्पी ने खुलासा किया कि आरोपी अपने दामाद डिप्लेंदु कुमार, बेटी वंदना सिंह और अन्य सहयोगियों के जरिए कहते हैं, “तुम्हारे ही पैसों से तुम्हारा केस हार दूंगा।” परिवार पूरी तरह अकेला और हताश है क्योंकि सिस्टम में कहीं भी उन्हें न्याय नहीं मिल रहा। पड़ोस के लोग भी कहते हैं कि सुरेंद्र को पंचायती में बुलाकर मामला निपटाया जाए, लेकिन वह हर बार फरार होने की कोशिश करता है। शिम्पी ने साफ तौर पर कहा कि अगर परिवार या वे खुद किसी भी तरह का नुकसान उठाते हैं, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सुरेंद्र प्रताप सिंह, वंदना सिंह, डिप्लेंदु कुमार, दिलीप कुमार उरांव, पप्पू शाह और उनके गुर्गों की होगी।

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उन्होंने बताया कि जितनी बार भी पैसा दिया गया, उसकी रसीद पर अनिल उरांव उर्फ डीके उरांव के हस्ताक्षर मौजूद हैं, जो इस पूरे खेल की गहराई को दर्शाते हैं। इस घटना ने न सिर्फ आर्थिक संकट पैदा किया, बल्कि परिवार की मानसिक स्थिति को भी तहस-नहस कर दिया। चार सालों से जारी इस लड़ाई में मालती देवी और शिम्पी की जिंदगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुकी है। उनकी बेटी की शादी टूट गई, परिवार में तनाव का माहौल है, और वे लगातार न्याय की तलाश में दर-दर भटक रही हैं। उनका संघर्ष बिहार में बढ़ते हुए जमीन फर्जीवाड़े की एक बड़ी समस्या को भी उजागर करता है, जहां कमजोर, गरीब और अकेले पड़ोसी तक के भरोसे ठगे जा रहे हैं। यह मामला केवल एक पारिवारिक आर्थिक विवाद नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संकट है जो कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली की नाकामी को भी बयां करता है।

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दबंगों के बेल तो आसानी से हो जाते हैं, मगर गरीब और हताश परिवार न्याय के लिए वर्षों तक संघर्ष करता रहता है। मालती देवी और शिम्पी की कहानी हर उस व्यक्ति की आवाज़ बन रही है, जो अपने हक के लिए जूझ रहा है, लेकिन सियासत और दबंगई के आगे तन्हा पड़ गया है। यहां न्याय व्यवस्था की सच्चाई का आईना दिखता है, जहां अफसर और पुलिस का दखलदार रवैया, कोर्ट-कचहरी की जटिल प्रक्रियाएं, और दबंगों का संरक्षण कमजोरों के जीवन को दांव पर लगा देता है। इस बीच, मालती देवी और उनकी बेटी शिम्पी की आंखों में अभी भी न्याय की उम्मीद जल रही है, लेकिन उनका संघर्ष न्याय के नाम पर हुई इस ठगी और अन्याय की कहानी की करुण छाया के बिना अधूरा है।

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