SAHARSA NEWS,अजय कुमार : कोशी विकास संघर्ष मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष विनोद कुमार झा ने सहरसा की जनता से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि आज हमारा समाज एक अजीब दौर से गुजर रहा है। चुनाव आते ही कुछ लोग जात-पात, धर्म-मजहब की राजनीति करने लगते हैं, जबकि ये वही लोग हैं जो न कभी जनता के संघर्ष में साथ रहे और न किसी दुख-संकट में खड़े हुए।श्री झा ने कहा कि जो व्यक्ति जात-पात और मजहब के नाम पर लोगों को बाँटता है।वह कभी आपका अपना नहीं हो सकता। उसका प्रेम शराब के नशे जैसा है जो रातभर दिखता है, सुबह खत्म हो जाता है। आज जब माता-पिता, पुत्र, पति-पत्नी तक के बीच मतभेद और हिंसा बढ़ी है, तब कौन-सी जाति या धर्म आकर उस स्थिति को संभालता है? इसलिए जातिवाद की राजनीति हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा धोखा है। उन्होंने कहा कि सहरसा की धरती ने हमेशा सेवा, संघर्ष और एकता की मिसाल कायम की है। यही भूमि है जहाँ जनता ने विशेश्वरी देवी, रमेशं झा, लहटन चौधरी, चौधरी सलाउद्दीन, परमेश्वर कुंवर, शंकर टेकरीवाल, संजीव झा जैसे जननेताओं को समर्थन दिया — क्योंकि वे जाति नहीं, जनहित के प्रतीक थे।छठ पर्व का उल्लेख करते हुए श्री झा ने कहा ,कल ही आस्था का महापर्व छठ सम्पन्न हुआ। क्या किसी घाट पर जाति पूछकर अर्घ्य दिया गया? नहीं — क्योंकि आस्था और मानवता जाति-धर्म से ऊपर होती है। फिर चुनाव के समय यह जातिवाद क्यों?उन्होंने कहा कि जाति या धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोग न तो इलाज के समय आपके पास आते हैं, न बेटी के विवाह में, न संकट के समय। उनका मकसद जनता की सेवा नहीं, बल्कि जनता का उपयोग करना है।
संघर्ष की कीमत — जात-पात की राजनीति ने सच्चे योद्धा को किनारे कर दिया।श्री झा ने गहरे भाव से कहा शायद यही कारण है कि मैं स्वयं उम्मीदवार नहीं बन सका।
क्योंकि मैंने तय किया कि मैं जाति-धर्म की राजनीति नहीं करूँगा।मुझे मालूम था कि अगर मैं जात-पात का सहारा नहीं लूँगा, तो जाति और धर्म के ठेकेदार — चाहे वे मेरे अपने ही क्यों न हों — मत देने में हिचक सकते हैं और यही सबसे बड़ी विडंबना है कि जो व्यक्ति समाज के लिए वर्षों तक संघर्ष करता है।अदालत से लेकर सड़क तक जनहित की लड़ाई लड़ता है, उसी की हार को कुछ लोग यह कहकर ठुकरा देते हैं कि ‘संघर्ष का क्या परिणाम निकला?’ लेकिन मैं इसे अपनी हार नहीं, बल्कि समाज के विवेक की अग्निपरीक्षा मानता हूँ।”श्री झा ने सहरसा की जनता से अपील की — अब समय है नफरत की राजनीति को पहचानने का। जो व्यक्ति या दल समाज को बाँटने का काम करता है, उसे अपने दिल से निकाल फेंकिए। भगवान ने हमें विवेक दिया है — उसे जगाइए, सोचिए, समझिए और फिर मतदान कीजिए।
मतदान जात-पात देखकर नहीं, सहरसा के भाईचारे और विकास को देखकर कीजिए। अंत में उन्होंने कहा “यह अपील न किसी जाति की है, न किसी धर्म की — यह सहरसा की आत्मा की आवाज़ है।जय सहरसा, जय कोशी।



