यूजीसी नियम, जातीय विवाद, सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और चाहिए क्या?

संपादकीय, Editorial:                                                                                                                              ( नंदकिशोर सिंह  )

 

समानता की खोज में समाज

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और जातीय भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों का उद्देश्य यह था कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों की जांच और निवारण के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।

यूजीसी के नए नियमों के तहत संस्थानों में शिकायत निवारण समितियों का गठन, जांच प्रक्रिया, दंडात्मक प्रावधान और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को परिभाषित किया गया था। यह नियम मुख्य रूप से एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ होने वाले जातीय भेदभाव को केंद्र में रखकर तैयार किए गए थे।

सवर्ण समाज की नाराजगी और तर्क
इन नियमों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यूजीसी के नियमों में केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव का उल्लेख किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग को भेदभाव का शिकार मानने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।

सवर्ण समाज का तर्क था कि कानून समानता के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए और यदि किसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव होता है, तो उसे भी कानून के दायरे में समान रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि एकतरफा कानून सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है और इससे समाज में विभाजन की भावना बढ़ सकती है।

समाज के विभिन्न वर्गों का विरोध
यूजीसी के इन नियमों के खिलाफ केवल राजनीतिक या सामाजिक संगठन ही नहीं, बल्कि साधु-संत, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी और फिल्म जगत से जुड़े लोग भी खुलकर सामने आए। उनका मत था कि शिक्षा का क्षेत्र सामाजिक समरसता का केंद्र होना चाहिए, न कि जातीय विवाद का मंच। धीरे-धीरे यह मुद्दा कानून से आगे बढ़कर सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आजादी के 75 वर्षों में देश ने जातिरहित समाज की दिशा में प्रगति की है, ऐसे में पीछे जाने का सवाल उठता है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए नए नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी और उन्हें दोबारा ड्राफ्ट करने का निर्देश दिया। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक संतुलन की दृष्टि से भी एक गंभीर संदेश देता है।

इंसान, प्रकृति और अधिकार: एक व्यापक दृष्टि
होना तो यह चाहिए कि इस पृथ्वी पर सभी इंसानों को इंसान ही नहीं, बल्कि जानवरों और पशु-पक्षियों को भी प्राकृतिक और ईश्वरीय अधिकार प्राप्त हों — अपने स्वभाव के अनुसार स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार, जन्म से मृत्यु तक जीवन को उन्मुक्त रूप से जीने का अधिकार। परंतु वर्तमान व्यवस्था में मनुष्यों, जानवरों, पशु-पक्षियों और प्रकृति को लेकर सैकड़ों-हजारों कानून बनते हैं और बिगड़ते हैं। पेड़-पौधों को काटने से लेकर मनुष्य के अधिकारों तक, नियमों की एक लंबी श्रृंखला है — चाहे वे पूरी तरह लागू हों या नहीं।

ईश्वर ने सभी जातियों को समान जीवन शक्ति दी है। भोजन, निवास, शरीर की बनावट और जीवन का मूल स्वरूप सभी के लिए एक-सा है। सभी को जन्म लेना है, जीवन जीना है और मृत्यु को प्राप्त करना है। लेकिन यही मनुष्य अपनी शक्ति और स्वार्थ के अनुसार अधिकारों का गलत प्रयोग करता है और दूसरों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करता है। जाति और धर्म के नाम पर समाज को इतना विभाजित कर दिया गया है कि मनुष्य मनुष्य के खिलाफ खड़ा हो जाता है। देश के लिए जीना पृथ्वी के लिए जीने के बाद आता है, लेकिन किसी भी देश के भीतर की व्यवस्था न्यायपूर्ण होनी चाहिए।

देश एक परिवार होता है और परिवार के भीतर ही किसी को विशेषाधिकार देकर और किसी को हाशिये पर डालकर समाज को बांटना सामाजिक और प्राकृतिक दृष्टि से अन्यायपूर्ण है। दुख तब होता है जब सरकार द्वारा जारी नियमों को लोग अपने-अपने लाभ और हानि के चश्मे से देखने लगते हैं और जाति के नाम पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
ऐसा लगता है मानो जन्मों-जन्मों की दुश्मनी हो। यह किसी भी रूप में एक स्वस्थ समाज की पहचान नहीं हो सकती।

सनातन दृष्टि और सामाजिक समरसता
भारत आज भी सनातन परंपरा की छांव में जीवन जीने का प्रयास कर रहा है। सनातन व्यवस्था सादगी, प्रकृति से जुड़ाव और संतुलन का प्रतीक रही है। भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में भारतीय जीवन-शैली को अपनाया जा रहा है। यदि यह व्यवस्था सही न होती, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पूरा विश्व योग दिवस मनाने के लिए तैयार न होता।

जातियां पहचान हो सकती हैं, लेकिन बुद्धिमानी या कर्म की सीमा नहीं।
कभी कर्म के आधार पर जातियों का विभाजन हुआ होगा, लेकिन आज हर जाति हर प्रकार का कार्य कर रही है।
यही सामाजिक सामंजस्य हमें ऊंचा उठाएगा। अपने वर्तमान के कलंकित संघर्षों में उलझने के बजाय हमें भविष्य की अच्छाई के बीज बोने होंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश हमें यही संदेश देता है कि कानून केवल वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए समान होना चाहिए। समानता, न्याय और समरसता ही भारत की असली शक्ति है — और यही किसी भी लोकतंत्र की आत्मा भी।

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