संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह )
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रहा टैरिफ विवाद अब समाप्ति की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार, लगभग 44 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर लगाए गए अमेरिकी टैक्स को हटाने का निर्णय लिया गया है। इसे भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को किसानों और युवाओं के हित में बताया है और कहा है कि सरकार ने किसानों को राहत देने के उद्देश्य से संतुलित और दूरदर्शी समझौता किया है। उन्होंने भारतीय उद्योग जगत को भी भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि यह डील देश के व्यापार और निवेश के लिए लाभकारी साबित होगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इस समझौते का वास्तविक लाभ देश के आम नागरिक तक पहुंचेगा, या यह भी केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का अनुभव बताता है कि अक्सर इनके फायदे बड़े उद्योगों और कॉर्पोरेट जगत तक सिमट जाते हैं, जबकि आम जनता को महंगाई और टैक्स का बोझ उठाना पड़ता है। इस समझौते के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। उन्होंने अपने हालिया बयान में भी यही बात दोहराई। लेकिन इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या भारत वास्तव में रूस से तेल खरीद कम करने जा रहा है, या यह केवल अमेरिकी राजनीति का हिस्सा है? अगर भविष्य में भारत को रूस के बजाय अमेरिका या अन्य देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ा, तो इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ेगा।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले से ही आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। यदि तेल आयात महंगा हुआ, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें और बढ़ेंगी, परिवहन खर्च बढ़ेगा, माल ढुलाई महंगी होगी और रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगेंगे। इसका सबसे बड़ा बोझ मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग पर पड़ेगा, जिनकी आय पहले ही सीमित है और खर्च लगातार बढ़ रहा है। आज भारत का आम नागरिक टैक्स के मकड़जाल में फंसा हुआ है। पर्सनल इनकम टैक्स, टोल टैक्स, रोड टैक्स, जीएसटी, बैंक चार्ज, लोन की कठोर शर्तें, एटीएम और खाते से जुड़े शुल्क—ये सभी मिलकर आम आदमी की आर्थिक स्वतंत्रता को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं। देश के नाम पर, व्यवस्था के नाम पर या मजबूरी में भारतीय नागरिक इन सबको चुपचाप सह रहा है, लेकिन यह सहनशीलता अब एक गहरी पीड़ा में बदल चुकी है।
यदि उच्च वर्ग को अलग कर दिया जाए, तो सबसे ज्यादा पिस रहा है मध्यम वर्ग। न उसे सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिलता है, न ही वह महंगाई से बच पाता है। उसकी आय सीमित है, लेकिन जिम्मेदारियां असीमित हैं। यही कारण है कि आज भारत का मध्यम वर्ग खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहा है। सरकार का दावा है कि अमेरिका के साथ हुई यह डील भारतीय किसानों के लिए सुरक्षा कवच साबित होगी, लेकिन यह दावा कितनी हकीकत में बदलेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा। यह भी आशंका है कि यदि विदेशी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में बड़ी मात्रा में आए, तो छोटे और मध्यम किसानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। सवाल यह भी है कि क्या भारतीय किसान वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर पाएंगे, या वे एक बार फिर बाजार की ताकतों के सामने कमजोर साबित होंगे।
अमेरिका-भारत व्यापार समझौता कूटनीति और व्यापार के स्तर पर एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इसकी असली परीक्षा तब होगी जब इसका असर आम भारतीय की जिंदगी पर दिखाई देगा। आज भारत का नागरिक सिर्फ विकास के दावों से नहीं, बल्कि अपनी जेब, अपनी रसोई और अपने भविष्य से जुड़े सवालों से जवाब चाहता है। अगर महंगाई बढ़ती रही, टैक्स का बोझ बढ़ता रहा और मध्यम वर्ग की स्थिति कमजोर होती गई, तो अंतरराष्ट्रीय समझौतों की सफलता आम जनता के लिए खोखली साबित होगी। देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि देश का नागरिक मजबूत हो। क्योंकि अगर आम आदमी ही कमजोर होगा, तो किसी भी समझौते की सफलता केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएगी, जनता के जीवन तक नहीं।



