SAHARSA NEWS : हिंदी एवं उर्दू एक साझा विरासत को ले विमर्श का हुआ आयोजन

SAHARSA NEWS,अजय कुमार : स्नातकोत्तर केंद्र पश्चिमी परिसर सहरसा के हिंदी विभाग द्वारा हिंदी पखवाड़ा के समापन के मौके पर, हिंदी एवं उर्दू एक साझा विरासत को ले विमर्श का आयोजन हिंदी विभाग अध्यक्ष कक्ष में शुक्रवार को किया गया।आयोजित विमर्श में हिस्सेदारी लेते हुए विभागीय प्रोफेसर डॉक्टर सिद्धेश्वर कश्यप ने कहा कि, हिंदी हो या उर्दू दोनों भाषाएं सांप्रदायिक सौहार्द एवं आपसी भाईचारे को प्रारंभ से ही महत्व देते चली आ रही है, इस क्रम में उन्होंने उर्दू शायर रसीद की चर्चा करते हुए कहा कि, उन्होंने लिखा है ‘बनाकर दिलों को मोहब्बत का मंदिर’ जलाते सदाकत की हम आरती, ‘हमें जाति मजहब से मतलब नहीं है, जो भारत में रहते हैं सब भारतीय’ दूसरी और साहिर लुधियानवी द्वारा लिखित गीत ना ‘हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, तू इंसान बनेगा’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इन दोनों शायरों ने अपनी कृति में मजहबी एकता का पुरजोर संदेश दिया, इसके अतिरिक्त उन्होंने मैथिली शरण गुप्त की यह पंक्ति ‘हिंदू हो या मुसलमान हो नीच रहेगा, फिर भी नीच, मनुष्यता सबसे ऊपर है मान्य महीमंडल के बीच’।विमर्श को आगे बढ़ाते हुए, विभाग की प्राध्यापिका डॉ अणीमा ने कहा कि चाहे हिंदी साहित्य हो या उर्दू साहित्य, दोनों साहित्य को स्थापित करने वाले रचनाकार दोनों ही साहित्यिक विधा से जुड़े हुए हैं, चाहे अमीर खुसरो हो, या फिर रहीम, कबीर, जायसी या रसखान हो, इन सबों के द्वारा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं आध्यात्मिकता को धरातल पर प्रतिष्ठित करने का कार्य किया गया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में विभाग के अध्यक्ष डॉ लाला प्रवीण कुमार सिन्हा ने कहा कि, हिंदी उर्दू के रचनाकार समवेत रूप से सर्व धर्म समभाव की वकालत करते हैं, इस क्रम में उन्होंने कबीर की पंक्ति ‘मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में ना मैं कावा ना मैं काशी ना मथुरा कैलाश में’ की चर्चा करते हुए कहा कि भले ही आज हमारे समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाया जा रहा है तथा सामाजिक कटुता पैदा करने की कोशिशें निरंतर की जा रही है किंतु हमारे साहित्यकारों ने इस स्थिति का आरंभ से ही विरोध किया और आपसी भाईचारे को अपने साहित्य का विषय बनाया और इस मामले में हिंदी और उर्दू दोनों साहित्यकारों की महती भूमिका रही है। विमर्श के समापन के उपरांत भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के उर्दू के पूर्व विभागअध्यक्ष डॉ फसीउद्दीन एवं डॉक्टर सिद्धेश्वर कश्यप द्वारा संपादित पुस्तक उर्दूः एक मुश्तरका विरासत की प्रति विभागीय अध्यक्ष एवं विभागीय प्राध्यापिका को भेंट की गई।आयोजित कार्यक्रम में विभाग के छात्र राहुल, गौरव एवं छात्रा गुड़िया, तनु एवं वैष्णवी भी मौजूद रही।

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