सहरसा, अजय कुमार : शहर के मत्स्यगंधा स्थित वैदेही कला संग्रहालय सहरसा के सहयोग से उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान लखनऊ 13-18 नवंबर के बीच जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर छह दिवसीय मुखौटे प्रदर्शनी का आयोजन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान लखनऊ में किया जाएगा। प्रदर्शनी में देश के विभिन्न भागों से एक सौ साठ जनजातीय मुखौटे, प्रदर्शित किए गए हैं। प्रदर्शनी की परिकल्पना तथा संयोजन प्रो. ओम प्रकाश भारती द्वारा किया गया है।प्रदर्शनी के संयोजक प्रो भारती ने कहा जनजातीय मुखौटे जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक,धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। इनका अभिप्राय मुख्य रूप से आध्यात्मिक, रक्षात्मक और सामुदायिक पहचान से जुड़ा होता है। ये मुखौटे केवल सजावट के साधन नहीं, बल्कि पूर्वजों की आत्माओं, देवताओं, प्रकृति की शक्तियों या पौराणिक चरित्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जनजातीय संस्कृति में इन्हें नृत्यों, उत्सवों, नाट्य प्रदर्शनों और पूजा-अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता है, जो समुदाय को बुरी शक्तियों से बचाने, फसल की अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने, सामाजिक सद्भाव बनाए रखने और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का कार्य करते हैं। उदाहरणस्वरूप, ये मुखौटे पूर्वजों की स्मृति को उजागर करते हुए जनजातीय समाज का सांस्कृतिक पहचान है। भारत के विभिन्न जनजातीय समुदायों में, जैसे मध्य प्रदेश की आदिवासी जनजातियों में, इन्हें नवरात्रि के दौरान देवी के रूप में पूजा जाता है, जबकि बस्तर की मुरिया जनजाति इन्हें छेरता उत्सव में आनुष्ठानिक नृत्यों के लिए बनाती है। कुल मिलाकर, ये मुखौटे प्रकृति, आस्था और सामुदायिक एकता के माध्यम से आदिवासी जीवन की आधारशिला को प्रतिबिंबित करते हैं।जनजातीय मुखौटों की विशेषताएं उनकी सामग्री, डिजाइन, रंगों और उपयोगिता में निहित हैं, जो स्थानीय संसाधनों और सांस्कृतिक आवश्यकताओं पर आधारित होती हैं। ये मुखौटे आमतौर पर प्राकृतिक सामग्रियों से बनाए जाते हैं, जैसे मिट्टी, लकड़ी, कागज माचे, नारियल के छिलके, आरी का धूल, इमली का पेस्ट, मोम, रेजिन, बांस, कपास और कपड़ा। कुछ क्षेत्रों में धातु (जैसे कांस्य या पीतल) का उपयोग लॉस्ट वैक्स तकनीक से किया जाता है।
रंग प्राकृतिक रंगों (पौधों और खनिजों से) से प्राप्त होते हैं, जैसे नारंगी, सफेद, पीला, लाल और काला, जो जीवंत और विपरीत प्रभाव पैदा करते हैं।डिजाइन की दृष्टि से, इनमें अतिरंजित विशेषताएं होती हैं, जैसे बड़े-बड़े आंखें, होंठ, नाक, भौंहें, दांत और दाढ़ी, जो नाटकीय प्रभाव के लिए बनाई जाती हैं। ये मुखौटे पौराणिक, जनजातीय या प्राकृतिक प्रतीकों से सजे होते हैं, और निर्माण प्रक्रिया में मोल्डिंग, सुखाना, सजाना, चिकना करना और चित्रण शामिल होता है। ये हल्के और टिकाऊ होते हैं ताकि नृत्य या प्रदर्शन के दौरान आसानी से पहने जा सकें।प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा अरुण असीम, समाज कल्याण मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार का पदार्पण हुआ उन्होंने प्रदर्शनी की तारीफ की।



