काशी में जी रही है इंसानियत की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल: एक चुप्पी से चलने वाला अनकहा कारवाँ

वाराणसी , संपादकीय: वाराणसी की उन तंग गलियों में जहाँ सुबह-शाम मंदिरों की घंटियाँ बजती हैं और गंगा की लहरें मोक्ष की बातें करती हैं, वहीं पिछले कई सालों से रात के सन्नाटे में एक सफ़ेद रथ बिना हॉर्न बजाए, बिना लाइटें जलाए चुपचाप निकलता है – इसमें न कोई झंडा है, न कोई बैनर, बस कुछ थके हुए पर संकल्प से भरे लोग और गरमागरम भोजन की खुशबू। नाम है “विश्वकला भोजन रथ” – इसे चलाते हैं भारतीय रेलवे के बनारस लोकोमोटिव वर्क्स में कार्यरत वरिष्ठ लेखा परीक्षक प्रणय कुमार झा और उनकी छोटी-सी टीम, जो दिन में सरकारी नौकरी करते हैं और रात में इंसानियत की ड्यूटी।

यह रथ अब सिर्फ़ भोजन नहीं बाँटता; यह उन लोगों को ढूँढता है जो फुटपाथ पर सोते हैं, अस्पताल के बाहर रात काटते हैं, या जिनके पास अंतिम संस्कार के लिए भी दस रुपये नहीं होते। कोविड के दिनों में जब पूरी दुनिया दरवाज़े बंद करके बैठी थी, तब ये लोग मास्क लगाकर सड़कों पर थे – प्रवासी मज़दूरों के बच्चों के लिए बिस्किट, बुजुर्गों के लिए दवाई, और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते लोगों के लिए पानी की बोतलें। आज यह रथ सर्दियों में कंबल ओढ़ाता है, गर्मियों में ठंडा पानी पिलाता है, बीमार को मुफ़्त एम्बुलेंस से अस्पताल पहुँचाता है और जो दुनिया से चल बसा, उसे भी अकेला नहीं छोड़ता – लावारिस शवों को कंधा देता है, चंदन की लकड़ी जुटाता है और अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था खुद करता है।

ये सब कुछ बिना किसी सरकारी फंड, बिना किसी एनजीओ ग्रांट के चल रहा है – दानदाता कोई बड़ा उद्योगपति नहीं, बल्कि आप जैसे-हम जैसे लोग हैं जो दस रुपये, बीस रुपये, कभी एक बोरी आटा, कभी पुराने कंबल भेजते हैं। प्रणय झा कहते हैं, “मैं अकेला कुछ नहीं, मेरे साथी और दान देने वाले हर हाथ मेरी असली ताकत हैं।” रात ढाई बजे भी अगर कोई फ़ोन करे कि फलाने पुल के नीचे कोई बुजुर्ग ठंड से मर रहा है, तो दस मिनट में टीम वहाँ पहुँच जाती है। कोई फ़ोटो नहीं खिंचवाता, कोई वीडियो नहीं बनवाता – बस चुपचाप काम करके लौट आता है। यही वजह है कि शहर के ज़्यादातर लोग इसे जानते तो हैं, पर नाम से नहीं, बस उस “सफ़ेद गाड़ी” से जो रात में गरम रोटी लेकर आती है।

वाराणसी ने सदियों से दुनिया को मोक्ष का रास्ता दिखाया है, लेकिन आज यह छोटा-सा रथ बता रहा है कि मोक्ष का असली रास्ता भूखे को रोटी देना, ठंड से काँपते को कंबल ओढ़ाना और मरने के बाद भी इंसान को इंसान की तरह विदा करना है। यह कोई ख़बर नहीं, यह उस शहर की आत्मा की कहानी है जो अभी भी जीवित है। अगर आप भी इस कारवाँ का हिस्सा बनना चाहते हैं – थोड़ा-सा समय, थोड़ा-सा दान, या बस एक संदेश – तो आज ही जुड़ जाएँ।

फेसबुक पेज: www.facebook.com/vishwkalabhojanrath यहाँ आपको रोज़ाना सच्चाई दिखेगी – बिना चमक-दमक के, बिना ड्रामा के, सिर्फ़ इंसानियत के। क्योंकि जब तक एक भी इंसान भूखा सोएगा, ठंड से काँपेगा या अकेला मरेगा, तब तक हमारा धर्म अधूरा है। विश्वकला भोजन रथ इसी अधूरे धर्म को पूरा करने की ज़िद लिए सड़कों पर दौड़ रहा है – बिना रुके, बिना थके, बिना नाम के।

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