संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह )
भारत के संविधान लागू होने के 75 वर्ष बाद राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक वंदे मातरम् को स्पष्ट प्रोटोकॉल के साथ पुनः प्रतिष्ठित किया जाना एक ऐतिहासिक क्षण है। भारत के गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी 2026 को जारी सर्कुलर ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी कार्यक्रमों, विद्यालयों और औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम् निर्धारित धुन और समय-सीमा (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड) के साथ गाया जाएगा तथा इसके दौरान सभी उपस्थितजन खड़े होकर सम्मान देंगे। यह केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भावनात्मक राष्ट्र प्रेम को संस्थागत स्वरूप देने का प्रयास है। वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्पंदन है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में रचा था। स्वतंत्रता संग्राम के समय यह क्रांतिकारियों का उद्घोष बना। फांसी के फंदे पर झूलते वीरों के अंतिम शब्दों में “वंदे मातरम्” गूंजता था।आजादी से पहले आजादी के दीवानों के लिए यह गीत लाहौर, कराची, ढाका और चटगांव तक राष्ट्रीय चेतना की लहर बन चुका था। उस कालखंड में यह गीत भावनात्मक राष्ट्र प्रेम का ज्वालामुखी था, जिसने दासता के अंधकार में प्रकाश का संचार किया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में यह व्यवस्था की गई कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान पाएगा। राष्ट्रगान के लिए विधिक संरक्षण और समय-सीमा स्पष्ट हुई, परंतु वंदे मातरम् के लिए लंबे समय तक एक समान प्रोटोकॉल निर्धारित नहीं हुआ। इससे इसकी प्रस्तुति में विविधता रही। अब जब स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हुए हैं, तो यह राष्ट्रीय अनुशासन और एकरूपता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 2017 में Supreme Court of India में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर जनहित याचिकाएँ दायर हुई थीं, जिनमें राष्ट्रगान और राष्ट्रीय सम्मान पर व्यापक बहस हुई। अश्विनी उपाध्याय जैसे राष्ट्रभक्त और देश प्रेमी वकील ने अपने सोशल हैंडल पेज पर चर्चा भी की है कि उन्होंने 2017 में पीआईएल दाखिल किया था परंतु इतने साल हो गए कोर्ट में कुछ अच्छा सुनने को मिलता उसे पहले गृह मंत्रालय ने इतना अच्छा काम कर दिया जो देश और संस्कृति के लिए बड़ी बात है उन्होंने अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए बहुत-बहुत बधाई दी है। यद्यपि वंदे मातरम् को अनिवार्य करने संबंधी कोई अंतिम बाध्यकारी आदेश पारित नहीं हुआ, परंतु उस विमर्श ने राष्ट्रीय सम्मान के प्रश्न को पुनः केंद्र में ला दिया। आज का यह सर्कुलर उसी दीर्घकालिक चर्चा का परिणाम प्रतीत होता है।
जहां किसी राज्य या क्षेत्र में राष्ट्र के प्रति समर्पण की कमी दिखती है, वहां केवल कानून पर्याप्त नहीं होता; वहां शिक्षा, संस्कार और संवाद आवश्यक हैं। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं का अध्ययन, राष्ट्रीय पर्वों का सामूहिक आयोजन और प्रतिदिन राष्ट्रीय गीत का सम्मानपूर्वक गायन — ये सब भावनात्मक राष्ट्र प्रेम को हृदय में रोपते हैं। जब नागरिक यह अनुभव करेंगे कि राष्ट्र पहले है और हम बाद में, तब व्यक्तिगत स्वार्थ की सीमाएँ स्वतः विस्तृत होकर राष्ट्रीय हित में परिवर्तित हो जाएंगी।
मेरा स्पष्ट मत है कि यदि भारत के प्रति सभी नागरिकों का प्रेम सर्वोपरि हो जाए, तो जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की दीवारें स्वतः बिखर जाएंगी। भावनात्मक राष्ट्र प्रेम व्यक्ति को व्यापक बनाता है। तब विरोध भी राष्ट्रहित में होगा, विभाजन के लिए नहीं। जब “राष्ट्र” हमारी चेतना का केंद्र बनेगा, तब हम एक-दूसरे में दुश्मनी नहीं, बल्कि प्रेम खोजेंगे। अंततः, वंदे मातरम् का यह पुनर्सम्मान केवल एक सरकारी आदेश न रह जाए, बल्कि जन-जन के हृदय में राष्ट्रभक्ति का पुनर्जागरण बने — यही अपेक्षा है। राष्ट्र सुरक्षित रहेगा तो हम सुरक्षित रहेंगे। और जब प्रत्येक नागरिक के मन में भारत के प्रति भावनात्मक राष्ट्र प्रेम जागृत होगा, तब यह देश केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक शक्ति बनकर विश्व के सामने खड़ा होगा।
वंदे मातरम्।



