लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले जाति आधारित राजनीति फिर उबाल पर आ गई है और विभिन्न दलों के बीच ओबीसी, दलित, ब्राह्मण, ठाकुर तथा अन्य पिछड़े वर्गों की सियासी जमीन पर खींचतान तेज हो गई है। भाजपा ने हाल ही में ओबीसी और दलित नेताओं को प्रमुख पदों पर प्रमोट करने की कोशिश की है, लेकिन पार्टी के अंदर ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं की नाराजगी बढ़ रही है, जिससे गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं समाजवादी पार्टी ने यादव-मुस्लिम समीकरण को मजबूत करने के साथ-साथ ब्राह्मण और ठाकुर वोट बैंक साधने के लिए नए चेहरों को आगे लाने की रणनीति अपनाई है और अखिलेश यादव ने हाल के भाषणों में ‘समानता और भाईचारा’ पर जोर देते हुए जाति आधारित असमानता को खत्म करने की बात कही है।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने के संकेत दिए हैं और पार्टी ने कई सीटों पर गैर-जाटव दलित उम्मीदवारों को तैयार करने की योजना बनाई है। कांग्रेस ने भी ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ फॉर्मूला को फिर से जीवित करने की कोशिश की है लेकिन पार्टी की कमजोर संगठनात्मक स्थिति इसे चुनौतीपूर्ण बना रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 के मुकाबले इस बार जाति का समीकरण और जटिल हो गया है क्योंकि ओबीसी के अंदर भी कुर्मी, लोध, राजभर, निषाद आदि उपजातियों की अलग-अलग मांगें उभर रही हैं और ठाकुर-ब्राह्मण वोट बैंक में भी बंटवारा दिख रहा है।
दादरी, नोएडा जैसे पश्चिमी यूपी के क्षेत्रों में भाजपा का दबदबा कमजोर होने के संकेत मिल रहे हैं, जबकि पूर्वांचल और बुंदेलखंड में सपा-बसपा के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है। जाति जनगणना की मांग को लेकर भी राजनीतिक दलों के बीच तकरार तेज है और सपा-कांग्रेस इसे चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में हैं। कुल मिलाकर यूपी की सियासत में जाति का कड़ाह फिर उबल रहा है और अगले एक साल में यह और गरम होने वाला है, जिससे 2027 का चुनावी नतीजा तय करने में जाति समीकरण निर्णायक भूमिका निभाएगा।



