डेढ़ साल से परीक्षा का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों का फूटा गुस्सा, VC चैंबर के बाहर भिंड़त

PAT 2024-25 पर पूर्णियाँ विश्वविद्यालय में महाबवाल! फीस लेकर डेढ़ साल लटकाया, अब परीक्षा रद्द—कुलपति चैंबर के सामने कुलपति के सरकारी गार्ड और प्राइवेट बाउंसरों से छात्रों की भिड़ंत

अंग इंडिया / पूर्णियाँ : पूर्णियाँ विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश परीक्षा यानी PAT 2024 और PAT 2025 को निरस्त किए जाने के बाद बुधवार को छात्रों और अभ्यर्थियों का आक्रोश विश्वविद्यालय परिसर में खुलकर सामने आ गया। लंबे समय से परीक्षा की प्रतीक्षा कर रहे अभ्यर्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया। मामला इतना बढ़ गया कि कुलपति चैंबर के बाहर छात्रों और कुलपति के सरकारी गार्ड और प्राइवेट बाउंसरों के बीच भिड़ंत की स्थिति उत्पन्न हो गई। स्थिति को संभालने के लिए पुलिस को मौके पर पहुंचना पड़ा। हंगामे के कारण विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन में दोपहर करीब दो बजे तक कामकाज भी प्रभावित रहा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन अभ्यर्थियों से परीक्षा के नाम पर आवेदन लिया गया, शुल्क वसूला गया, जिन्होंने समय और संसाधन लगाकर महीनों तैयारी की और जो करीब डेढ़ वर्ष से परीक्षा का इंतजार कर रहे थे, आखिर उनकी इस परेशानी की जिम्मेदारी कौन लेगा? परीक्षा प्रक्रिया शुरू करने के बाद लंबे समय तक अभ्यर्थियों को इंतजार कराना और फिर परीक्षा को निरस्त कर देना छात्रों के लिए बेहद गंभीर स्थिति है। छात्रों का कहना है कि उनका समय केवल परीक्षा की तारीख के इंतजार में नहीं बीता, बल्कि उनके करियर और शोध की पूरी प्रक्रिया इस अनिश्चितता में अटकी रही।

अभ्यर्थियों के अनुसार PAT 2024 और PAT 2025 के लिए विश्वविद्यालय ने आवेदन प्रक्रिया पूरी कर ली थी। परीक्षा को लेकर अभ्यर्थियों ने अपनी तैयारी भी जारी रखी, लेकिन लंबे इंतजार के बाद परीक्षा आयोजित करने के बजाय इसे रद्द कर दिया गया। यही फैसला छात्रों के आक्रोश का मुख्य कारण बना। छात्रों का सवाल है कि यदि परीक्षा प्रक्रिया को लेकर कोई प्रशासनिक या नियामकीय असमंजस था तो उसे समय रहते दूर क्यों नहीं किया गया और अभ्यर्थियों को इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा की स्थिति में क्यों रखा गया। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन की उस दलील पर भी सवाल उठाया, जिसमें परीक्षा निरस्त करने के लिए लोकभवन के निर्देश का हवाला दिया जा रहा है। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का कहना था कि अन्य विश्वविद्यालयों के सामने भी निर्देश से जुड़ी स्थिति थी, लेकिन वहां विश्वविद्यालयों ने अपनी स्थिति लोकभवन के सामने रखते हुए आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त किया और प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। ऐसे में पूर्णियाँ विश्वविद्यालय ने समय रहते स्पष्ट दिशा-निर्देश हासिल करने की पहल क्यों नहीं की, यह सवाल अब छात्रों के बीच प्रमुखता से उठ रहा है।

छात्रों का आरोप है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने समय रहते लोकभवन से मार्गदर्शन मांग लिया होता तो शायद अभ्यर्थियों को डेढ़ वर्ष तक परीक्षा की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। विश्वविद्यालय की प्रशासनिक प्रक्रिया में यदि कोई बाधा थी तो उसका समाधान विश्वविद्यालय स्तर पर किया जाना चाहिए था, लेकिन उसका खामियाजा उन अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ा जिन्होंने परीक्षा के लिए आवेदन किया और अपनी तैयारी में समय लगाया। यही कारण है कि छात्रों का आक्रोश केवल परीक्षा रद्द होने को लेकर नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में हुई देरी और अनिश्चितता को लेकर है। अपनी मांगों को लेकर जब छात्र कुलपति से वार्ता करने पहुंचे तो कुलपति चैंबर के बाहर कुलपति के सरकारी गार्ड और प्राइवेट बाउंसरों की मौजूदगी ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। छात्रों और बाउंसर के बीच भिड़ंत की नौबत आ गई। स्थिति बिगड़ती देख पुलिस मौके पर पहुंची और काफी समझाने के बाद छात्रों को शांत कराया गया। इसके बाद प्रदर्शनकारी छात्रों की कुलपति प्रो. विवेकानंद सिंह के साथ बंद कमरे में वार्ता हुई।

यह स्थिति विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए भी गंभीर सवाल खड़ा करती है कि अपनी मांगों को लेकर कुलपति से मिलने पहुंचे छात्रों के सामने ऐसी परिस्थिति क्यों पैदा हुई। छात्रों की शिकायतों को संवाद के माध्यम से सुना जाना चाहिए, क्योंकि विश्वविद्यालय परिसर में पढ़ाई, शोध और अकादमिक संवाद का वातावरण होना चाहिए। छात्रों और सुरक्षा व्यवस्था के बीच टकराव की स्थिति बनना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। कुलपति के साथ हुई वार्ता के बाद छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन अब नए सिरे से आवेदन लेने की बात कह रहा है। इन आवेदनों को लोकभवन भेजकर PAT 2024 और PAT 2025 के संबंध में मार्गदर्शन मांगे जाने की बात सामने आई है। आगे की परीक्षा प्रक्रिया लोकभवन से मिलने वाले मार्गदर्शन के आधार पर तय किए जाने की बात कही गई है।

लेकिन छात्रों के लिए यह सवाल अभी भी कायम है कि नए आवेदन लेने से पहले पुराने अभ्यर्थियों के साथ क्या होगा और उनके द्वारा पहले से किए गए आवेदन, इंतजार और तैयारी का क्या समाधान निकलेगा। विश्वविद्यालय को अब केवल एक नई प्रक्रिया शुरू करने के बजाय पूरे मामले पर स्पष्ट, लिखित और समयबद्ध निर्णय सामने रखना होगा, ताकि अभ्यर्थियों को फिर से अनिश्चितता में न रहना पड़े। कुलपति से वार्ता के बाद विश्वविद्यालय के आउटसोर्सिंग कर्मियों और छात्रों के बीच भी नोकझोंक की स्थिति बनी। इससे परिसर में कुछ समय के लिए फिर तनाव पैदा हुआ। हालांकि बाद में स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया और विश्वविद्यालय का कामकाज सामान्य करने की कोशिश की गई।

दरअसल, PAT 2024 और PAT 2025 का विवाद अब केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रह गया है। यह उन अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन गया है जो शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए विश्वविद्यालय की प्रक्रिया पर निर्भर हैं। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भी PAT 2024 एवं 2025 के अभ्यर्थियों के आवेदन शुल्क वापसी से संबंधित सूचना तथा शोध प्रवेश से जुड़े अन्य नोटिस उपलब्ध हैं, जिससे स्पष्ट है कि इन सत्रों की प्रक्रिया विश्वविद्यालय के स्तर पर औपचारिक रूप से चल चुकी है। ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों को केवल आश्वासन देने के बजाय पूरी स्थिति को पारदर्शी तरीके से स्पष्ट करे। किस आधार पर परीक्षा निरस्त की गई, पहले से चल रही प्रक्रिया को रोकने की जरूरत क्यों पड़ी, अभ्यर्थियों के पुराने आवेदन और शुल्क का क्या होगा, नई आवेदन प्रक्रिया क्यों आवश्यक है और परीक्षा को लेकर आगे की समयसीमा क्या होगी—इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब छात्रों को मिलना चाहिए।

छात्रों का आक्रोश इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि शोधार्थी बनने की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। एक परीक्षा के लिए डेढ़ वर्ष तक इंतजार करना और उसके बाद प्रक्रिया को फिर से शुरू किए जाने की बात सामने आना उनके अकादमिक भविष्य को सीधे प्रभावित करता है। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझना होगा कि फाइलों और प्रशासनिक निर्णयों में बीतने वाला समय अभ्यर्थियों के लिए उनके करियर का महत्वपूर्ण समय होता है। अब निगाहें विश्वविद्यालय के अगले कदम और लोकभवन से मांगे जाने वाले मार्गदर्शन पर टिकी हैं। छात्रों की मांग है कि PAT 2024 और PAT 2025 के अभ्यर्थियों के हित में जल्द से जल्द स्पष्ट निर्णय लिया जाए और उन्हें दोबारा लंबी प्रतीक्षा में न रखा जाए। विश्वविद्यालय के लिए यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करने का विषय नहीं, बल्कि उन अभ्यर्थियों के भविष्य और संस्थान की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।

फिलहाल पूर्णियाँ विश्वविद्यालय परिसर में हुए इस बवाल ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—आखिर परीक्षा के लिए डेढ़ साल इंतजार करने वाले अभ्यर्थियों के इस नुकसान की भरपाई और उनके भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या कुलपति लेंगे? क्या छात्र कल्याण पदाधिकारी लेंगे? क्या रजिस्ट्रार लेंगे? अब छात्रों को आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट निर्णय, निश्चित समयसीमा और उनके हित में ठोस कार्रवाई का इंतजार है।