आलू की फसल किसानों के लिए बनी नासूर, व्यापारी खरीदने से कतरा रहे

संवाददाता अंग/रूपौली/

रूपौली प्रखंड क्षेत्र में इस वर्ष आलू की फसल किसानों के लिए किसी नासूर से कम नहीं बन गई है। हालात ऐसे हैं कि किसान रातों की नींद खो चुके हैं और कोई भी व्यापारी किसी भी कीमत पर आलू खरीदने को तैयार नहीं है। अनुमान के मुताबिक करीब 70 प्रतिशत आलू सूर्य की रोशनी के संपर्क में आकर हरे हो चुके हैं, जिससे उनकी बाजार में कोई मांग नहीं रह गई है।

किसानों ने बताया कि प्रखंड क्षेत्र में मुख्य रूप से उजला किस्म का आलू लगाया जाता है, जिसे 75 से 85 दिनों के भीतर उखाड़ लिया जाता है और उसके बाद मक्का या सब्जीवर्गीय फसल बो दी जाती है। इस बार लगभग 90 प्रतिशत किसानों ने अक्तूबर माह में हुई भारी बारिश से पहले ही आलू की रोपाई कर दी थी। लेकिन अचानक हुई तेज बारिश से फसल को भारी नुकसान हुआ।

बारिश के कारण खेतों की मिट्टी काफी बैठ गई, जिससे आलू की फसल पर समुचित तरीके से मिट्टी नहीं चढ़ाई जा सकी। परिणामस्वरूप आलू के कंद धीरे-धीरे बढ़ते हुए ऊपर आ गए और सूर्य की रोशनी में आने से वे हरे हो गए। हरे आलू न तो खाने योग्य माने जाते हैं और न ही बाजार में इन्हें खरीदा जाता है।

स्थिति यह है कि किसान केवल करीब 30 प्रतिशत आलू ही बेच पा रहे हैं, जबकि शेष आलू खेतों में ही छोड़ने को मजबूर हैं। क्षेत्र में कहीं भी कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं होने के कारण किसान आलू को सुरक्षित रख भी नहीं पा रहे हैं। कई जगहों पर खेतों में फैला आलू यूं ही सड़ने की कगार पर है।

स्थानीय किसान दिवाकर सिंह, सुबोध सिंह, मंजूला देवी, अजीत चौबे, सुरेश जायसवाल, श्रवण साह सहित अन्य किसानों ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन में कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी थी, जब मजबूरी में किसानों को खेतों में ही आलू फेंककर घर लौटना पड़े। किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत भी नहीं निकल पा रही है, जिससे वे भारी आर्थिक संकट में फंस गए हैं।

किसानों ने सरकार से इस प्राकृतिक आपदा को देखते हुए मुआवजा देने की मांग की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस गंभीर समस्या को लेकर क्या ठोस कदम उठाती है या फिर किसानों को उनकी बदहाल स्थिति पर ही छोड़ दिया जाता है।

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