लोकतंत्र, कानून और लोलुप सत्ताभोगियों की लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट का तटस्थ निर्णय

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह  )

पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतंत्र, संविधान और कानून के बीच चल रही एक गहरी वैचारिक लड़ाई का रूप ले चुकी है। बांग्लादेशी घुसपैठ, प्रशासनिक पक्षपात, SIR प्रक्रिया का विरोध, CBI और ED की कार्रवाइयों पर सवाल, और सत्ता को हर हाल में बनाए रखने की जिद—ये सभी घटनाएं मिलकर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर को बेहद संवेदनशील और चिंताजनक बना रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वहां सत्ता की ताकत से लोकतांत्रिक संस्थाओं और आम समाज पर दबाव बनाने की कोशिश लगातार तेज हो रही है।

इसी संदर्भ में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का विरोध और उनका स्वयं वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक असाधारण घटना के रूप में दर्ज हो गया। ममता बनर्जी ने यह तर्क दिया कि यह प्रक्रिया विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में ही लागू की जा रही है, जबकि असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में ऐसा नहीं हो रहा। उन्होंने चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक कदम बताया। इस मामले में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी भी वकील के रूप में अदालत में उपस्थित हुए और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों, अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नामों को “logical discrepancy” सूची में डालने, और अज्ञात व्यक्तियों द्वारा हजारों आपत्तियां दर्ज कराने जैसे गंभीर मुद्दों को उठाया।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा कि SIR की प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई जा सकती। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ किया कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के अनुसार कार्य करेगा और न्यायपालिका इसमें किसी भी तरह की बाधा स्वीकार नहीं करेगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी मुख्यमंत्री का वकील के रूप में पेश होना संविधान की ताकत को दर्शाता है, तो यह भी उतना ही सत्य है कि न्यायिक निर्णय केवल कानून और तथ्यों के आधार पर ही दिए जाएंगे, न कि राजनीतिक दबाव या व्यक्तिगत प्रभाव से।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती में निहित है।

पश्चिम बंगाल में CBI और ED की कार्रवाइयों का विरोध, प्रशासनिक फैसलों पर राजनीति, और सामाजिक तनाव के बीच सत्ता की जिद ने राज्य की स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहे विवाद, हिंदू-मुस्लिम तनाव, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक ध्रुवीकरण यह संकेत देते हैं कि यदि कानून और संविधान की मर्यादा कमजोर हुई, तो सामाजिक ताना-बाना भी खतरे में पड़ सकता है।

कभी सुप्रीम कोर्ट का न्याय देश की अव्यवस्था को संभालता है, तो कभी कार्यपालिका और संसदीय व्यवस्था लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व निभाती है। यही भारतीय संविधान की सबसे बड़ी ताकत है कि सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे कानून के सामने झुकना ही पड़ता है। आज देश के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाए, लोकतंत्र की मर्यादा को बनाए रखा जाए और कानून का राज सुनिश्चित किया जाए। ढुलमुल कानून नहीं, बल्कि निष्पक्ष और मजबूत कानूनी व्यवस्था ही भारत को अंदर से मजबूत बना सकती है। यही भारतीय लोकतंत्र की रक्षा का मार्ग है और यही भारत के भविष्य की गारंटी भी ।

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