SAHARSA NEWS,अजय कुमार : गायत्री शक्तिपीठ में व्यक्तित्व परिष्कार सत्र को संबोधित करते हुए डा अरुण कुमार जायसवाल ने कहा की अहंकार एक भ्रम है, जिसके ऊपर यह भ्रम चढ़ता है वह अपने को भगवान से कम नहीं समझता है।अरे संसार में एक ही भगवान है आप कहाँ से आ गए? भगवान है तो भगवान को रहने दै, आप कहाँ से प्रकट हो गए? सच कहें तो अहंकार भगवान का विरोधी है, अहंकार एक नया भगवान बनकर खड़ा हो जाता है। और जब अहंकार शक्ति संपन्न हो जाए तो फिर कहना ही क्या, सोने पर सुहागा नहीं करैला पर नीम चढ़ जाता है। एक तो करेला तीता होता है नीम उससे भी ज्यादा तीता होता है। फिर तो वह नाग हो जाता है, हमेशा फुफकारता रहता है। फिर तो परमात्मा ही जानें वह क्या क्या हो जाता है। आपकी उपलब्धियां, आपकी समृद्धि, आपकी यश गाथा, सभी अहंकार को बढ़ाती है अगर विवेक रहे तो व्यक्ति मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाता है। पर ये बहुत मुश्किल का काम है, आप कहाँ अटक जाएंगे, कहाँ भटक जाएंगे, पता ही नहीं चलता सच पूछिये तो ये अहंकार की माया है। विवेक ही हमे होश में रखता है।अहंकार हमेशा अज्ञान से पैदा होता है, महर्षि पतंजलि के शब्दों में अहंकार की माता अविद्या है। अविद्या से अस्मिता यानी अहंकार, अस्मिता से राग द्वेष और राग द्वेष से अभिनिवेश यानी भया ये मानव जीवन के पंच क्लेश हैं। यही क्रम है। तो अहंकार पैदा होता है अविद्या से, अज्ञान से। ये कितना बड़ा अजान है कि मैं ही सब कुछ हूँ, अरे आपके पहले भी दुनिया थी और आप के बाद भी दुनिया रहेगी। आसक्ति और अहंकार, यही सबसे बड़ा रोग है। मैं है अहंकार और मेरा है आसक्ति यानी मोह यानी स्वार्थी आसक्ति के बिना स्वार्थ कहाँ से सथ जाएगा। मैं और मेरा का जोड़ आदमी को हमेशा भय में डाले रखता है। द्वंद और द्वैत का नाम संसार है। दो होंगे तो संसार होगा, दो होगा तो अहंकार भी होगा, किस पर अहंकार करेगा? किस पर अधिपत्य जताएगा? किस पर अधिकार जताएगा? दूसरे पर ही ना तेरा है तो मेरा भी होगा, मैं और मेरा ही होगा।
वेदांत कहता है, जहाँ दूसरा हुआ वैसे ही भय पैदा हुआ यानी अभीनिवेश पैदा हुआ। द्वन्द और द्वैत से निकलने के लिए आपको प्रकृति के राज्य से निकलना होगा, प्रकृति के पार जाना होगा। ये अहंकार हमें कहीं का नहीं छोड़ता, अहंकार पर जब चोट पड़ती है तो आदमी बेबस लाचार हो जाता है, विवश हो जाता है। जब हम बीमार पड़ते हैं, अशक्त हो जाते हैं, हम विवश हो जाते हैं, बिस्तर पर पड़े होते हैं, तब हमारा अहंकार धूल धूसरित हो जाता है। समय यानि काल बताता है आप कौन हो. हू आर यू? उस समय भय पैदा होता है भय यानी अभिनिवेश, मृत्यु का भया पर मृत्यु तो अज्ञात है, दरअसल मेरी फैक्टरी, मेरा बैंक बैलेंस, मेरा सामाज्य, उसके छूटने का भय होता है। मज़े की बात है मृत्यु के समय भी ऐसे इंसान के अंदर अहंकार के अलावा और कुछ नहीं रहता है। लेकिन अहंकार के ध्वस्त होते समय अगर आप पॉज़िटिव हैं तो फिर भक्ति का उदय होता है। ईगो सेंट्रिक जीवन, अच्छा काम करने की सोच के बावजूद, उसमें गंदगी घुसेड देता है। स्वार्य और अहंकार आदमी को आदमी रहने नहीं देता। अहंकार नीचे उतरने नहीं देता है, उसको बड़ी छटपटाहट, बड़ी तिलमिलाहट, बड़ी बेचैनी होती रहती है।
कोई लाइमलाइट में आकर कोई डार्क में जाना नहीं चाहता है। महत्वाकांक्षा और अहंकार मन को मस्तिष्क को बहुत दूषित करते हैं, बहुत मलिन हो जाता है मन, उसमें हम देखे ही नहीं पाते किसी की प्रगति, किसी का सुखा व्यक्ति को प्राकृतिक जीवन जीना चाहिए, जीवन प्राकृतिक होना चाहिए उसका पर्यायवाची शब्द है जीवन नैसर्गिक होना चाहिए।एक बात सभी को समझनी चाहिए कि सांसारिक जीवन में अहंकार कष्टकारी है, नुकसानदायक भी है, पर आध्यात्मिक जीवन में अहंकार विनाशक है, आपको कहीं का नहीं रखेगा। इसलिए जो आत्मनोमुख जीवन जीना चाहते हैं, दिन में 70 बार अपनी परीक्षा करनी चाहिए कि मेरा मैं कहाँ है? संत कबीर क्या कहते हैं जब मैं था तो हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं। सब अंधियारा मिट गया, दीपक देख्या माही। जब अहंकार रूपी मैं था, तो भगवान नहीं थे, अब भगवान है तब मैं यानी अहंकार नहीं है, सारा अंधकार दूर हो गया, दीपक को मैंने देख लिया, ये दीपक क्या है? दीपक है शुद्ध चिता महर्षि पतंजलि कहते है न स्फटिक की तरह निर्मल चित्त होना चाहिए। चित्त अहंकार से मुक्त हो चुका है, अपने आप प्रकाश फैल गया है, ये शुद्ध चित दीया है। काश दीपावली हम ऐसे ही मना पाते, शुद्ध चित्त का दिया जला पाते, अब तो दीपावली लोकाचार रह गया है, जबकि दीपावली तमस को हटाने का त्यौहार है। दीपावली का मर्म यही है हम छोटे हैं तो क्या हुआ, सामर्थ्य छोटी है तो क्या हुआ, छोटे दीपक है तो क्या हुआ, दीपमालिका से अंधकार को हटाएंगे, तमस को हटाएंगे और प्रकाश को फैलाएंगे। प्रत्येक साल थोड़ा थोड़ा तमस हटे तो शायद एक दिन चित्त भी पूरी तरह निर्मल हो जाए, अन्दर अपने आप प्रकाश फैल जाए। अन्दर प्रकाश फैलेगा तो बाहर प्रकाश अपने आप फैल जायेगा। पर अहंकार के रहते यह संभव नहीं है।निष्कर्ष यह है कि जैसे खाने में आप जहर घोल दें, वह खाना कोई नहीं खा सकता है। जीवन में अहंकार नाम का विष पैदा हो जाए, आपके अंदर नाग फुफकारने लगे, फिर वह जीवन किसी काम का नहीं रहता। अंहकार एक ऐसा नाग है जो आपके अंदर घुसा हुआ है। वह आपको किसी काम का रहने नहीं देगा। तो मूल बात यह है, चाहे वो मनुष्य हो, देवी हो, देवता हो, पशु हो, पक्षी हो, नाग हो, किन्नर हो सभी अहंकार की माया से बंधे हुए हैं। दानव तो अहंकार की पर्याय ही हैं, इसलिए इससे पीछा छुड़ा लेने में ही भलाई है। ध्यान से समझने की बात है, सुख शांति सुकून ईश्वर चरणों के अलावा कहीं नहीं मिल सकता है।



