Bihar Election 2025, प्रिंस(अन्ना राय) : बिहार की सियासत में ‘सीमांचल का गांधी’ कहे जाने वाले मरहूम जनाब तस्लीमुद्दीन की राजनीतिक विरासत अररिया जिले की जोकीहाट विधानसभा सीट पर एक बार फिर सुर्खियों में है। 1959 में सिसौना पंचायत से सरपंच का चुनाव जीतकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले तस्लीमुद्दीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री (एच डी देवगौड़ा सरकार में) के पद तक पहुँचे और सीमांचल की राजनीति के शुरू से ही धुरी रहे। आज उनके निधन के बाद, उनकी विरासत को लेकर उनके दो पुत्र—सरफराज आलम और शाहनवाज आलम—फिर से चुनावी मैदान में आमने-सामने हैं, जिसने इस मुस्लिम बहुल सीट के मुकाबले को अत्यंत रोमांचक बना दिया है।
विरासत की लड़ाई: 2020 का इतिहास और 2025 की चुनौती
तस्लीमुद्दीन के दोनों बेटे पहले भी 2020 के विधानसभा चुनाव में आमने-सामने थे। 2020 का उलटफेर: 2020 में, राजद ने सीटिंग एमएलए शाहनवाज आलम का टिकट काट कर बड़े भाई सरफराज आलम को प्रत्याशी बनाया था। लेकिन शाहनवाज आलम ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के टिकट पर त्रिकोणीय मुकाबले में राजद प्रत्याशी सरफराज आलम को 7,383 वोटों से पराजित किया। शाहनवाज को 59,596 मत मिले थे, जबकि सरफराज को 52,213 और भाजपा के रंजीत यादव को 49,933 मत प्राप्त हुए थे। शाहनवाज का कद बढ़ना: बाद में जब शाहनवाज आलम ने एआईएमआईएम के पांच विधायकों को तोड़कर राजद में शामिल हुए, तो राजद में उनका कद बढ़ गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में राजद ने शाहनवाज आलम पर ही भरोसा जताया, लेकिन वे भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह से 20,094 मतों से हार गए। (प्रदीप कुमार सिंह: 6,00,146; शाहनवाज आलम: 5,80,052)।
सरफराज का जन सुराज से ताल ठोकना
चर्चा है कि 2024 लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने पर सरफराज आलम ने शाहनवाज की खुलकर मुखालफत की थी, जिसे शाहनवाज की हार का एक कारण माना गया। बावजूद इसके, 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद ने सरफराज के बदले शाहनवाज पर ही भरोसा जताते हुए उन्हें जोकीहाट से प्रत्याशी बनाया। इसके बाद, बड़े भाई सरफराज आलम ने राजद से नाता तोड़ लिया और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के टिकट से अपने छोटे भाई के खिलाफ मैदान में उतरकर फिर से ताल ठोक दी है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने उदाहाट इलाके में मंच से दावा किया है कि तस्लीमुद्दीन के असली वारिस उनके बेटे सरफराज ही हैं।
जोकीहाट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
जोकीहाट सीट का महत्व केवल पारिवारिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समीकरणों के कारण सीमांचल की एक निर्णायक सीट है: मुस्लिम बहुलता: अररिया जिले के जोकीहाट में लगभग 65 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो चुनावी परिणामों की दिशा तय करती है। तस्लीमुद्दीन का गढ़: यह सीट 1967 में अस्तित्व में आई थी और तब से लेकर अभी तक कुल 16 चुनावों (उपचुनाव सहित) में तस्लीमुद्दीन और उनके बेटों ने कुल 11 बार जीत हासिल की है। यह सीट उनके परिवार का अभेद्य गढ़ मानी जाती है। तस्लीमुद्दीन की विरासत पर दावे और प्रतिदावों के बीच, जोकीहाट का यह मुकाबला केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि परिवार की राजनीतिक श्रेष्ठता और सियासी दलों की रणनीति की अग्निपरीक्षा बन गया है।



