Bihar Election 2025,प्रिंस(अन्ना राय) : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की रणभेरी बज चुकी है और अररिया जिले की फारबिसगंज विधानसभा सीट पर राजनीतिक पारा चढ़ना शुरू हो गया है। यह सीट दशकों तक कांग्रेस का गढ़ रही और अब लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का अभेद्य किला बनी हुई है। 2025 का यह चुनाव सत्ताधारी NDA गठबंधन के लिए इस मजबूत पकड़ को बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
भौगोलिक और व्यापारिक महत्व
फारबिसगंज अररिया जिले के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है और इसका भौगोलिक महत्व अत्यधिक है। यह नेपाल की सीमा से मात्र आठ किलोमीटर दूर है और पटना से लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह कस्बा सड़क और रेल दोनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
निकटवर्ती केंद्र: अररिया (28 किमी), जोगबनी (13 किमी), और पूर्णिया (75 किमी) इसके पास के प्रमुख कस्बे हैं।
नेपाल व्यापार: नेपाल की तरफ, बिराटनगर मात्र 18 किमी दूर है और भारत-नेपाल व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है। धरान (80 किमी) और इतहरी (72 किमी) जैसे नेपाल के अन्य प्रमुख कस्बे भी जोगबनी के रास्ते से आसानी से पहुँचे जा सकते हैं। यह इलाका समतल और गंगा-कोसी के जलोढ़ मैदानों से बना है। हालांकि, कोसी और परमान नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में होने के कारण यहाँ मानसून के दौरान बाढ़ और जलभराव की समस्या आम है, जो कृषि और बुनियादी ढांचे दोनों को प्रभावित करती है। इसके बावजूद, मिट्टी उपजाऊ है और कृषि इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
राजनीतिक यात्रा: कांग्रेस के गढ़ से भाजपा का किला बनने तक
फारबिसगंज सीट की स्थापना 1951 में हुई थी और तब से अब तक यहाँ 17 बार चुनाव हो चुके हैं। यह विधानसभा क्षेत्र अररिया लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। कांग्रेस का प्रभुत्व (1952-1985): फारबिसगंज की राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से शुरू हुई थी। 1952 से 1985 के बीच कांग्रेस ने यहाँ नौ में से आठ बार जीत दर्ज की। सरयू मिश्रा का नाम इस दौरान रिकॉर्ड बनाता है, जिन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से 1962 में जीतने के बाद कांग्रेस में शामिल होकर लगातार छह बार चुनाव जीता। उनकी कुल सात जीत आज भी एक रिकॉर्ड है।
भाजपा की शुरुआत (1990): भाजपा ने 1990 में मयानंद ठाकुर की जीत के साथ यहाँ अपनी शुरुआत की। 2005 से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में है। लक्ष्मी नारायण मेहता ने 2005 के दोनों चुनावों में जीत दर्ज की, जिसके बाद 2010 में पद्म पराग रॉय जीते। वर्तमान स्थिति: 2015 से विद्यासागर केशरी विधायक हैं और लगातार दो बार सीट बचाए हुए हैं।
सीट का समीकरण और चुनावी गणित
फारबिसगंज ब्लॉक और इसके आसपास के ग्रामीण एवं शहरी इलाकों को मिलाकर बने इस क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या काफी महत्वपूर्ण है। मतदाता संख्या: 2020 में यहाँ 3,40,760 पंजीकृत मतदाता थे, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में बढ़कर 3,56,438 हो गए।
मुस्लिम मतदाता: 2020 में यहाँ 1,15,176 (करीब 33.80%) मुस्लिम मतदाता थे, जो इसे एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील सीट बनाती है।
मतदान प्रतिशत: यह क्षेत्र आमतौर पर अच्छा मतदान प्रतिशत दर्ज करता है (2020 में 60.56%)।
भाजपा की मजबूत स्थिति: 2020 के पिछले चुनाव में भाजपा के विद्या सागर केशरी ने कांग्रेस के जाकिर हुसैन खान को 19,702 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के प्रत्याशियों ने बढ़त बनाए रखी है। 2024 में भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह ने इस क्षेत्र में राजद के मोहम्मद शहनवाज आलम को 39,203 वोटों से हराया था। हालांकि जीत का अंतर कुछ हद तक कम हुआ है, फिर भी सभी समुदायों में पार्टी को स्थिर समर्थन मिलता दिख रहा है।
2025 की चुनावी तस्वीर और चुनौती
इस बार के चुनाव में कोसी-सीमांचल क्षेत्र की कई सीटों पर समीकरण बदलने के आसार हैं। NDA की रणनीति: यह सीट भाजपा के लिए सुरक्षित गढ़ मानी जाती है, लेकिन जीत का अंतर बनाए रखना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 6 नवंबर को फारबिसगंज में चुनावी सभा को संबोधित करने का कार्यक्रम, इस सीट पर भाजपा के फोकस को दर्शाता है। महागठबंधन की चुनौती: महागठबंधन की तरफ से कांग्रेस ने मनोज विश्वास को नया उम्मीदवार बनाया है, जो इस बार भाजपा को कड़ी टक्कर देने की कोशिश करेंगे। महागठबंधन इस सीट पर भगवा दल के गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
प्रमुख मुद्दे: चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे, जिनमें सीमावर्ती क्षेत्र का विकास, युवा रोजगार के अवसरों की कमी, कृषि उत्पादों के लिए बाजार और तस्करी से जुड़े मुद्दे चर्चा का विषय होंगे। तमाम समीकरणों के बावजूद, जब तक कोई बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम या जनसंख्या में बड़ा बदलाव नहीं होता, फारबिसगंज सीट पर भाजपा का पलड़ा भारी दिख रहा है, लेकिन महागठबंधन इस बार इसे कांटे की टक्कर में बदलने की पूरी कोशिश करेगा।



