पूर्णिया, अभय कुमार सिंह: Purnia News जिस इंसान के बनाये गए सामग्रियों के बिना कोई शुभ कार्य नहीं हो सकता, आज वे इस इक्कीसवीं शदी में भी समाज ही नहीं, बल्कि सरकार से भी उपेक्षित हैं तथा वे इस दंश को झेलने पर मजबूर हैं। शिक्षा की लौ से काफी दूर-दूर तक अंजान, आजभी वे गांव के बाहर ही रह रहे हैं तथा उनके पास लोगों का बस शुभ कार्य की सामग्री लाने भर से मतलब रहता है। प्रखंड के लगभग प्रायः गांवों में इनकी थोडी-बहुत आवादी देखी जा सकती है, परंतु भूमिहीन होने के कारण गांव के किनारे ही इनकी जिंदगी कटती है। बाबा भीमराव अंबेडकर का बनाया संविधान भी इन्हें आजतक समाज से पूरी तरह जोड नहीं पाया है। आजभी लोग इन्हें हेय-दृष्टि एवं छूआछूत की भावना रखते देखे जाते हैं।
यह बता दें कि यहां प्रायः हर गांव के किनारे सूप-डाला-दौरी बनाते महादलित के लोग दिख जाएंगे। कुछ तो सूअर भी पालते हैं, कुछ पैसे के अभाव में बस अपना किसी तरह पेट भरते-भरते इस दुनिया से विदा लेते हैं, सुख-सुविधा क्या जीच होती है, इन्हें शायद पता नहीं है। इनका मुख्य पेशा बस सूप-डाला-दौरी ही रह गया है। शिक्षा की लौ इनसे काफी दूर होने के कारण, ये अभी भी इससे काफी दूर हैं। इनके बच्चे मैट्रिक तक भी नहीं पढ पाते हैं। समाज में अंतिम पंक्ति पर खडे लोगों के विकास की कसमें खानेवाले सांसद-विधायक जीतने के बाद इनकी ओर देखते तक नहीं हैं। अगडा-पिछडा, दलित-महादलित, पिछडा- अतिपिछडा के विकास के लिए प्रतिदिन समाज में भी आवाजें गुंजती हैं, परंतु यह आवाज बस अपने विकास तक ही सिमटकर रह जाती है। इस संबंध में तेलडीहा गांव के महादलित परिवार कहते हैं कि पचीस साल पहले उन्हें एक इंदिरा आवास मिला था, वह आज टूट-फूट गया, बरसात में भींगकर रहते हैं।
बड़ा परिवार हो गया, रहने के लिए जमीन नहीं है, पोखर किनारे रह रहे हैं। सरकार दावा करती है कि महादलित सहित भूमिहीनों को चार डिसमिल जमीन देगी, परंतु उनकी ओर आजतक कोई देखने नहीं आया है। सच तो यह है कि छूआछूत को लेकर सभी लोग उनसे नजरें चुराते नजर आते हैं। सरकार फ्री में अनाज दे रही है, परंतु सिर्फ अनाज से पेट नहीं भरता है, इसके अलावा भी उन्हें कुछ चाहिए ताकि उस अनाज को खाना का रूप दिया जा सके। बगल में विद्यालय है, वहां सफाई करते हैं, परंतु महीना-साल बीत जाता है, मानदेय नहीं मिलता है। इससे उनके बच्चों की भी पढाई बाधित हो जाती है। कुल मिलाकर आज आजादी के अमृतकाल में भी बहुत से ऐसे पहलु हैं, जो सरकार से छूट रहे हैं। आज इनपर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि ये भी समाज की मुख्यधारा से जूड सकें। देखें सरकार इनके लिए क्या-क्या उपाय करती है, या फिर सिर्फ इनकी योजनाएं कागजों पर ही चक्कर काटती रहती है।



