पूर्णिया, अभय कुमार सिंह: Purnia News 1985 से रूपौली प्रखंड नहरों के जाल में जकड़ा पड़ा है, लेकिन एक बूंद पानी नहीं आया – जब 2014 और 2016 में दो बार आया भी तो बिरौली बाजार से बहियार तक सैकड़ों एकड़ आलू-गेहूं-मकई की फसलें डुबोकर बाढ़ ला दिया। करोड़ों की मरम्मत के बाद भी नहरें आज खंडहर हैं, शीशम के पेड़ तक चोरी हो गए।
किसान दिनेश जायसवाल, मंटू जायसवाल, पप्पू मंडल जैसे सैकड़ों अब थक हारकर चीख रहे हैं – “जब पानी देने की नीयत ही नहीं तो हमारी जमीन क्यों छीन रखी है? वापस कर दो, हम महंगे डीजल से ही खेती कर लेंगे।” बिजली भी पूरी नहीं पहुंची, नहरें कब्रिस्तान बनी हैं और फसलें सूख रही हैं। नई सरकार से फिर उम्मीद जगी है, लेकिन किसान पूछ रहे हैं – “क्या इस बार स्वाती की बूंद सचमुच बरसेगी या फिर निराशा ही मिलेगी?” रूपौली की यह व्यथा बिहार की सिंचाई व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।



