पूर्णिया, किशन : गवर्नमेंट बायसी डिग्री कॉलेज में प्रैक्टिकल और असाइनमेंट के नाम पर छात्रों से की जा रही कथित अवैध वसूली ने शिक्षा व्यवस्था की गंभीर सच्चाई को सामने ला दिया है। यह मामला अब केवल एक वायरल वीडियो तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कॉलेज की बदली हुई प्रशासनिक व्यवस्था और उसमें निहित अनियमितताओं पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। छात्रों का आरोप है कि व्यवस्था परिवर्तन के बाद शिक्षा के अधिकार को पैसों से जोड़ दिया गया, जो सीधे तौर पर छात्रहित के साथ खिलवाड़ है। छात्रों और जानकार सूत्रों के अनुसार, पूर्व में कॉलेज में एक स्पष्ट, पारदर्शी और सुचारू प्रक्रिया लागू थी। उस समय असाइनमेंट और प्रैक्टिकल की कॉपियां सीधे परीक्षा नियंत्रक (Exam Controller) के पास जमा होती थीं और इस पूरी प्रक्रिया में विद्यार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था। इससे न केवल पारदर्शिता बनी रहती थी, बल्कि छात्रों पर किसी भी तरह का आर्थिक दबाव भी नहीं था। आरोप है कि जब से कॉलेज के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) नौशाद आलम ने परीक्षा एवं शैक्षणिक कार्यों का संपूर्ण नियंत्रण अपने हाथों में लिया, उसी समय से कॉलेज में अवैध वसूली जैसी घटनाएं शुरू हुईं। छात्रों का कहना है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद प्रैक्टिकल और असाइनमेंट के नाम पर प्रति छात्र 50-50 रुपये की मांग की जाने लगी। कई छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि राशि न देने की स्थिति में उनके असाइनमेंट और प्रैक्टिकल जानबूझकर स्वीकार नहीं किए गए, जिससे उनका शैक्षणिक भविष्य खतरे में पड़ गया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने इन आरोपों को और बल दिया है। वीडियो में छात्र खुले तौर पर यह कहते नजर आ रहे हैं कि बिना पैसे दिए उनका शैक्षणिक कार्य रोका जा रहा था। वीडियो सामने आते ही कॉलेज परिसर में आक्रोश फैल गया और छात्रों ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग शुरू कर दी। बढ़ते दबाव के बीच कॉलेज प्रशासन द्वारा एक लैब मैनेजर को हटाने की कार्रवाई की गई, लेकिन छात्रों और अभिभावकों का मानना है कि यह कदम केवल मामले को दबाने का प्रयास है, न कि सच्ची कार्रवाई। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि जब यह अवैध वसूली व्यवस्था में बदलाव के बाद शुरू हुई, तो इसकी जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालना न्यायसंगत नहीं है। उनका तर्क है कि यदि बिना उच्च स्तर की सहमति या निर्देश के ऐसी वसूली संभव नहीं है, तो इस पूरे प्रकरण में प्राचार्य की भूमिका की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच अनिवार्य है। शिक्षा के नाम पर संचालित किसी भी संस्थान में इस प्रकार का आर्थिक शोषण न केवल छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि उनके भविष्य के साथ भी सीधा अन्याय है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों से आने वाले छात्रों के लिए यह अतिरिक्त बोझ उनके आत्मसम्मान और शिक्षा दोनों पर प्रहार करता है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच केवल दिखावटी कार्रवाई तक सीमित रहती है या फिर दोषियों को उनके पद और प्रभाव से ऊपर उठकर जवाबदेह ठहराया जाता है। छात्रों को उम्मीद है कि इस मामले में सच्चाई सामने आएगी और उन्हें न्याय मिलेगा।



