सहरसा, अजय कुमार : मिथिला विभूति ललित नारायण मिश्र (2 फरवरी 1923 – 3 जनवरी 1975) भारत के एक राजनेता थे जो 1973 से 1975 तक भारत के रेलमंत्री रहे। 3 जनवरी 1975 को समस्तीपुर बम-विस्फोट कांड में उनकी मृत्यु हो गयी थी।वे भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष थें। ललित बाबू के नहीं होने की पहली व्यंजना यह है कि मिथिला ने अपना रत्न खो दिया है। अपने सरल, सहज एवं सौम्य व्यक्तित्व के धनी स्मृति शेष ललित बाबू आज हमारे बीच न होकर भी अपने विराट व्यक्तित्व एवं निष्काम कर्म के चलते मिथिला के विकास पुरुष के रूप में सदा याद किए जाएंगे। उक्त बाते मैथिली अभियानी महाषी निवासी दिलीप कुमार चौधरी ने कही।उन्होने कहा कि 2 फरवरी 1923 ई के वसंत पंचमी के दिन ललित बाबू का अवतरण मिथिला के जनमानस को आत्मीय गौरव से भर देता है।सुखी एवं संपन्न परिवार में जन्म होने के बावजूद ललित बाबू के व्यक्तित्व को गढ़ने में कोशी क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की विशेष भूमिका रही है।कोशी की समस्याओं से रुबरु होने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। जिनका मानना था जो कोशी की विभिषिका से छुटकारा पाने के लिए बहुत बड़े राजनीतिक प्रयास की जरूरत है।जिसके लिए ललित बाबू को राजनीति में जाने के लिए प्रेरित करते रहे। जिसके चलते ललित बाबू के राजनीति में जाने की इच्छा बलवती होती गई।आगे चलकर अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देकर मिथिला का यह विराट व्यक्तित्व एक समय भारतीय राजनीति के लिए अपरिहार्य बन गया। अपनी दूरदर्शी सोच, रणनीतिक कौशल एवं मधुर स्वभाव के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री पं नेहरू के प्रिय पात्र बन गए।और यहीं से मिथिला के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। ललित बाबू छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय थे। अपनी सांगठनिक क्षमता के चलते हाई स्कूल के छात्र रहते हुए 1940 में थाना कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष बने।1946 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्य निर्वाचित हुए। 1946 -47 में पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम ए करने के बाद पटना में ही छात्र कांग्रेस समारोह का काम आयोजन किया जिसमें पं नेहरू जी को आमंत्रित किया।
यहीं से नेहरू जी के संपर्क में आए।1948-49 में बिहार में प्रथम आर्थिक सम्मेलन करवाने का भी ललित बाबू को ही है।एम ए की परीक्षा पास करने के बाद टी एन जे कालेज भागलपुर में व्याख्याता की नौकरी मिली। वे नौकरी से खुश थे। लेकिन पिता के कहने पर नौकरी छोड़नी पड़ी और सक्रिय राजनीति के तरफ उन्मुख हुए। ललित बाबू पहली बार1952में सहरसा दरभंगा से सांसद बने। सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने कोशी बांध का निर्माण और रेल के परिचालन की समस्या थी। चुनाव जीतने जीतने के उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद तथा बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह के साथ साथ कई वरिष्ठ राजनेताओं को बुलाकर कोशी क्षेत्र की वस्तुस्थिति से अवगत कराया साथ ही इसके निदान के लिए निर्णायक कदम उठाने को मजबूर किया। कोशी क्षेत्र की समस्याओं को लगातार उठाने को लेकर इन्हें आमलोगों से लेकर उनके सहकर्मी भी इन्हें कोशी मिश्र, कोशी बाबू एवं विकास पुरुष आदि नामों से संबोधित करने लगे। कुछ ही दिनों के बाद प्र मंत्री नेहरू 31 अक्टूबर अक्टूबर और 1 नवंबर 1953 ई में दो दिन के उत्तर बिहार दौरा के क्रम में युद्ध स्तर पर कोशी परियोजना को अंतिम रूप देने का आदेश निर्गत किया। 17 मार्च 1955 ई में ललित बाबू ने राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गुलज़ारी लाल नंदा सुप्रसिद्ध अभियंता कंवर सेन के साथ कोशी के पूर्वी तटबंध से संबंधित निर्माण स्थली का जायजा लिया। 30 अप्रैल 1959 में भारत सेवक समाज द्वारा वीरपुर में आयोजित समारोह में पं नेहरू एवं ललित बाबू का शुभागमन हुआ था।1965ई में तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने भी कोशी परियोजना का अवलोकन किया और कार्यों को गति देने का काम किया। यह ललित बाबू की सच्ची निष्ठा एवं लगन का प्रतिफल था जिसने कोशी बांध निर्माण के लिए 150 करोड़ रूपए का बजट पास करवाने में सफल रहे। उस समय देश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।आज की तरह उदारीकरण का दौड़ नहीं था।
आज-कल बड़ी से बड़ी योजना के लिए फंड की कोई कमी नहीं है।अब ललित बाबू द्वारा किए गए महत्वपूर्ण का उल्लेख करना चाहूंगा —कोशी बराज का निर्माण, कोशी बांध का निर्माण, दरभंगा और कोशी प्रमंडल का निर्माण, पूर्वी और पश्चिमी कोशी नहर परियोजना का निर्माण, कटैया जल विद्युत परियोजना, पूर्णिया और दरभंगा में वायु सैनिक हवाई अड्डा का निर्माण, अशोक पेपर मिल, मिथिला पेंटिंग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना,रेल कारखाना का का राष्ट्रीयकरण, मिथिला विश्वविद्यालय की स्थापना, मैथिली साहित्य अकादमी की स्थापना साथ ही कोशी बाढ़ से क्षतिग्रस्त रेल पथ का निर्माण और पुनः परिचालन शामिल है। उनकी नज़र मिथिला की सभी समसामयिक समस्याओं पर थी।वे समस्त मिथिला में मैथिली भाषा मे रामायण को उपलब्ध करवाने के लिए गीता प्रेस गोरखपुर से संपर्क साधने का मन बना लिए थे। विदित हो जो मैथिली भाषा में कविश्वर चंदा झा कृत”मिथिला भाषा रामायण” काफी लोकप्रिय है। ललित बाबू का मानना था मिथिला के साहित्य,लोक संस्कृति पर आधारित फिल्म बने ताकि मिथिला के गौरवशाली इतिहास एवं परंपरा के संवर्धन का मार्ग प्रशस्त हो। इसके लिए उसने वालीवुड अभिनेता सुनील दत्त से पहल की थी। चुंकि सुनील दत्त अपनी फिल्म के फ्लाप होने के क्रम में एक बार ललित बाबू से सहयोग लेने को मिले थे।सुनील दत्त एवं ललित बाबू एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव रखते थे। ललित बाबू के असामयिक निधन ने बहुत सारे विकास कार्य पर विराम लग गया। अपने राजनैतिक जीवन में ललित बाबू ने विभिन्न पदों पर काम किए जिसमें –योजना,श्रम,और रोजगार विभाग के संसदीय सचिव, गृह मंत्रालय में उपमंत्री, उप वित्त मंत्री,रक्षा राज्य मंत्री, विदेश व्यापार मंत्री और अंतिम समय में भारत सरकार के केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय राजनीति के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगा। इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के सबसे प्रभावशाली मंत्री थे।ललित बाबू अपने जीवन में बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया। जिसमें उग्रतारा स्थान एवं मंडन मिश्र के लिए किए गये कार्यों की चर्चा करना आवश्यक समझता हूं। महिषी गांव के प्रति वे सम्मान का भाव रखते थे। उन्होंने अपने कार्य काल में महिषी गांव को राष्ट्रीय मान चित्र पर लाने का काम किया। जिसमें मार्च 1970 ई में महिषी के मंडन मिश्र धाम पर “भारती मंडन स्मृति महासमारोह ” का ऐतिहासिक आयोजन किया गया था।जिसका की अध्यक्ष वे स्वयं थे। प्रो हरिमोहन झा सांस्कृतिक कार्यक्रम के अध्यक्ष थे।इस अवसर पर स्मारिका का भी विमोचन हुआ था। साथ ही भारती-मंडन स्मृति समिति, महिषी के नाम से एक कमिटी भी बना था। इसके बाद पर्यटक स्थल के रूप में महिषी को राष्ट्रीय फलक पर लाने के लिए पर्यटन कार्यालय की स्थापना की।जिसे हमलोगों ने भी देखा है।रेल मंत्री के रूप में महिषी -सहरसा से कुशेश्वरस्थान के बीच रेल सर्वेक्षण का भी काम किया। उग्रतारा स्थान के सौंदर्यीकरण की भी योजना उन्होंने बनाया था जो ग्रामीणों की अदूरदर्शिता की कारण संभव नहीं हो पाया।ये सभी कार्य इस बात की ओर इंगित करता है जो मां उग्रतारा के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। अब मैं थोड़ा अपने संस्मरण को साझा करना चाहूंगा। जब कभी भी चुनाव में प्रचार प्रसार में महिषी गांव आते थे तो खुले मंच से चर्चा करते थे जो यहां तो मेरी बहन की ससुराल है यहां मेरे कुटुंब लोग हैं। यहां तो वोट मांगने की जरूरत क्या है यहां तो वोट मिलेंगे ही। अंत में यही कहना चाहूंगा जो ललित बाबू का असामयिक चला जाना मिथिला के अरमानों का लूट जाना जैसा है। ललित बाबू जैसा न भूतो न भविष्यति द्रष्टा नेता होना असंभव है।



