
कुलपति के आदेश पर जारी सूची में ‘मृत’ कर्मचारी का प्रतिनियोजन, पूर्णियाँ विश्वविद्यालय की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
पूर्णियाँ: पूर्णियाँ विश्वविद्यालय एक बार फिर अपनी प्रशासनिक लापरवाही को लेकर चर्चा में है। कुलपति के आदेश पर कुलसचिव के हस्ताक्षर से जारी प्रतिनियोजन आदेश में ऐसे कर्मचारी का नाम शामिल कर दिया गया, जिनका निधन करीब साढ़े तीन महीने पहले हो चुका था। इस घटना ने विश्वविद्यालय प्रशासन, विशेषकर कुलपति कार्यालय की निगरानी और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विश्वविद्यालय द्वारा नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में कर्मियों की प्रतिनियुक्ति के लिए जारी सूची में डीएस कॉलेज, कटिहार के दिवंगत लिपिक का नाम भी दर्ज था। हैरत की बात यह है कि कर्मचारी के निधन के महीनों बाद भी विश्वविद्यालय के अभिलेखों में उनकी सेवा स्थिति अद्यतन नहीं हुई और उनके नाम पर प्रतिनियोजन आदेश तक जारी कर दिया गया।
शिक्षा जगत में इस घटना को साधारण त्रुटि मानने के बजाय प्रशासनिक विफलता के रूप में देखा जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि जब कुलपति के आदेश से कोई सूची जारी होती है, तो क्या उसके तथ्यों का सत्यापन नहीं किया जाता? यदि मृत कर्मचारी तक का रिकॉर्ड अद्यतन नहीं है, तो विश्वविद्यालय के अन्य प्रशासनिक निर्णयों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आलोचकों का कहना है कि विश्वविद्यालय में निर्णय लेने की प्रक्रिया कागजी औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गई है। आदेश जारी करने से पहले यदि संबंधित कर्मियों की स्थिति की समीक्षा की जाती, तो ऐसी शर्मनाक स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे लिपिकीय त्रुटि बताकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। हालांकि, यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर ऐसी चूक की जवाबदेही किसकी है—उस शाखा की जिसने सूची तैयार की, कुलसचिव की जिन्होंने हस्ताक्षर किए, या उस व्यवस्था की जिसके मुखिया कुलपति हैं? यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज है कि यदि मृत कर्मचारी को भी प्रतिनियोजित किया जा सकता है, तो विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और निर्णयों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।