बीएमसी का आईना, टूटा घमंड और बाला साहब के आदर्शों से भटका उत्तराधिकारी

The BMC's mirror, its pride shattered, and its successor even more misguided than Bala Saheb's.

सम्पादकीय :

कंगना का वह वाक्य आज फिर गूंज रहा है –
आज मेरा घर टूटा है कल तुम्हारा घमंड टूटेगा ।
आज घर नहीं पूरी राजनीति हिल गई है उद्धव ठाकरे की। वास्तव में उद्धव ठाकरे का घमंड भी टूटा है।

बीएमसी चुनाव का नतीजा सिर्फ एक नगर निगम का परिणाम नहीं है।यह उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—दोनों के लिए एक कठोर राजनीतिक आईना है।एक ऐसा आईना, जिसमें सत्ता का अहंकार, विचारधारात्मक भ्रम और जनता से बढ़ती दूरी साफ़ दिखती है।
आज जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे दोनों को मुंबई ने नकार दिया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—आख़िर मराठी अस्मिता के नाम पर यह राजनीति पहुँची कहाँ?मराठी अधिकार या भाषा के नाम पर अत्याचार?पिछले कुछ वर्षों में मुंबई और महाराष्ट्र में बार-बार ऐसे दृश्य सामने आए,जहाँ हिंदी भाषण देने,हिंदी बोलने,या हिंदी में व्यापार करने को लेकर
मारपीट, धमकी और दबाव की राजनीति की गई।
सवाल यह है—
क्या बाला साहब ठाकरे ने मराठी स्वाभिमान की कल्पना हिंदी भाषियों पर हाथ उठाने के लिए की थी?या फिर मराठी समाज को आत्मसम्मान, रोज़गार और नेतृत्व देने के लिए?अगर भाषा के नाम पर हिंसा ही राजनीति का आधार बन जाए,तो यह मराठी अस्मिता नहीं, राजनीतिक हताशा कहलाती है। जनता ने संदेश दे दिया बीएमसी चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि—

  • मुंबई को भाषा की लड़ाई नहीं चाहिए
  • मुंबई को गुंडागर्दी नहीं चाहिए
  • मुंबई को डर की राजनीति नहीं चाहिए
  • हिंदी भाषण के नाम पर बार-बार मारपीट,
  • दुकानदारों को डराना,सामान्य नागरिकों को अपमानित करना—यह सब जनता को स्वीकार नहीं है।

यही वजह है कि यह चुनाव राज और उद्धव दोनों के लिए बड़ा राजनीतिक झटका बन गया।उद्धव ठाकरे: बाला साहब के सिद्धांतों से भटकावबाला साहब ठाकरे ने विरोध किया था,लेकिन डराकर नहीं।वे कट्टर थे,लेकिन कायर नहीं।
आज उद्धव ठाकरे की राजनीति—

  • कविता से डरती है (केतकी चिताले)
  • बयान से डरती है (कंगना रनौत)
  • पूजा से डरती है (नवनीत राणा)
  • और भाषा के नाम पर आम आदमी पर हाथ उठाने को मौन सहमति देती है

यह बाला साहब की शिवसेना नहीं हो सकती।
बुलडोज़र, जेल और चयनात्मक सेक्युलरिज़्म

जब सत्ता में थे—
एक अभिनेत्री के घर पर बुलडोज़र चला
एक महिला कवयित्री को जेल भेजा गया
एक सांसद को गिरफ्तार किया गया
और तथाकथित लिबरल गैंग खामोश रहा। आज वही लोग लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं।

सवाल यह है—क्या लोकतंत्र विपक्ष में ही याद आता है?परंतु राजनीति डर से नहीं, भरोसे से चलती हैबीएमसी चुनाव ने यह साफ कर दिया है—मराठी समाज को,सम्मान चाहिए, रोज़गार चाहिए, विकास चाहिए भाषा के नाम पर हिंसा नहीं।
उद्धव ठाकरे अगर बाला साहब की विरासत का दावा करते हैं तो उन्हें याद रखना होगा—
बाला साहब कभी जनता से कटे नहीं थे।
और जो नेता जनता से कट जाता है,
वह अंततःकहीं का नहीं रहता।

नंदकिशोर
अध्यक्ष -प्रेस क्लब पूर्णिया
बीएसपीएस,बिहार

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