नई दिल्ली: चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और बदलते विश्व व्यवस्था के बीच अमेरिका ने अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में भारत को खास जगह देना शुरू कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका जहां एक ओर कई देशों के साथ अपने रिश्तों में सख्ती दिखा रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन आर्थिक निवेश और रणनीतिक साझेदारियों के जरिए दुनिया भर में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका को आशंका है कि कहीं वैश्विक शक्ति संतुलन पूरी तरह न बदल जाए। इस चुनौती से निपटने के लिए अमेरिकी संसद के द्विदलीय निकाय यूएस–चीन आर्थिक और सुरक्षा समीक्षा आयोग (USCC) ने फरवरी में भारत-केंद्रित एक अहम सार्वजनिक सुनवाई बुलाने का फैसला किया है। 17 फरवरी को होने वाली इस बैठक में अमेरिका, भारत और चीन के आपसी संबंधों, भारत-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन, सीमा विवादों से जुड़े तनाव, हिंद महासागर में समुद्री पहुंच और एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की भूमिका पर विस्तार से चर्चा होगी।
इसके साथ ही सुनवाई में भारत-चीन के आर्थिक और तकनीकी रिश्तों, व्यापार एवं निवेश, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और दवा आपूर्ति श्रृंखला जैसे अहम क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता की कोशिशों की भी समीक्षा की जाएगी। अमेरिका यह भी परखेगा कि भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को कैसे और मजबूत किया जाए और बीजिंग के साथ नई दिल्ली के रिश्ते भविष्य में अमेरिकी आर्थिक व सुरक्षा हितों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।
इस बैठक का समय इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि गलवान घाटी संघर्ष के बाद लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे भारत-चीन संबंध अब धीरे-धीरे पटरी पर लौटते दिख रहे हैं। अक्टूबर 2024 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात तथा इसके बाद उच्चस्तरीय संपर्कों ने रिश्तों में नरमी के संकेत दिए हैं। ऐसे में अमेरिका की यह पहल साफ इशारा करती है कि चीन को संतुलित करने की वैश्विक रणनीति में भारत अब वाशिंगटन की कूटनीति का अहम केंद्र बनता जा रहा है।



