बिहार का बजट, विकास और सीमांचल की आशाएं

संपादकीय, Editorial:                                                                                                                              ( नंदकिशोर सिंह  )

बिहार बजट 2026 को सरकार ने विकास, समावेसी और आर्थिक प्रगति का दस्तावेज बताया है। बजट में किसानों, महिलाओं, युवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, खेल, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों के लिए अनेक घोषणाएँ की गई हैं। सरकार का दावा है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है और राज्य की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आंकड़ों के स्तर पर यह दावा आंशिक रूप से सही प्रतीत होता है और कुछ वर्गों में विकास की झलक भी दिखाई देती है। लेकिन विकास का मूल्यांकन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीन पर महसूस होने वाले बदलाव से होता है। सवाल यह है कि क्या यह विकास बिहार के हर क्षेत्र तक समान रूप से पहुँचा है? क्या सीमांचल और कोसी क्षेत्र भी इस विकास यात्रा में बराबरी से शामिल हैं?

किसानों के लिए बजट में सिंचाई, फसल बीमा और कृषि यंत्रीकरण की घोषणाएँ की गई हैं, लेकिन सीमांचल का किसान आज भी बाढ़, बाजार और लागत के संकट से जूझ रहा है। हर वर्ष आने वाली बाढ़ किसानों की मेहनत को मिट्टी में मिला देती है, जबकि स्थायी समाधान की योजनाएँ अब भी कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं। महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों, छात्रवृत्ति और स्वास्थ्य योजनाओं का विस्तार स्वागतयोग्य है, लेकिन वास्तविक चुनौती महिलाओं को योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। शिक्षा और खेल के क्षेत्र में सुधार की बात की गई है, परंतु सीमांचल में आज भी उच्च शिक्षा संस्थानों, प्रशिक्षित शिक्षकों और आधुनिक खेल सुविधाओं का अभाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जाता है।

उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की नीति की चर्चा हुई है, लेकिन पूर्णिया और सीमांचल में बड़े उद्योगों की स्थापना को लेकर कोई ठोस रोडमैप दिखाई नहीं देता। जब तक इस क्षेत्र में उद्योग और रोजगार के अवसर नहीं बढ़ेंगे, तब तक युवाओं का पलायन रोकना संभव नहीं होगा। बाढ़ नियंत्रण के लिए बजट में प्रावधान किया गया है, लेकिन यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या बिहार हर वर्ष केवल बाढ़ से लड़ने की रणनीति बनाएगा या स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास करेगा? सीमांचल के लिए बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुकी है। पर्यावरण और स्वच्छता के लिए बजट में कुछ घोषणाएँ जरूर की गई हैं, लेकिन पशु-पक्षी संरक्षण के प्रति बजट की उदासीनता चिंता का विषय है। नीलगायों को समस्या मानकर निशानेबाज बुलाकर उन्हें मारने की घटनाएँ विकास की नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की प्रतीक हैं। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कल्पना अधूरी है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पूर्णिया और सीमांचल को इस बजट से क्या मिला? बजट दस्तावेज में पूर्णिया या सीमांचल के लिए कोई विशेष पैकेज, कोई बड़ी औद्योगिक परियोजना, कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का शैक्षणिक संस्थान या बाढ़ के स्थायी समाधान की स्पष्ट योजना दिखाई नहीं देती। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़ी सामान्य घोषणाओं का लाभ इस क्षेत्र को भी मिलेगा, लेकिन सीमांचल के लिए अलग से कोई ऐतिहासिक या निर्णायक घोषणा नहीं हुई है। यह क्षेत्र एक बार फिर सामान्य योजनाओं के भरोसे छोड़ दिया गया प्रतीत होता है। बिहार का विकास तब ही सार्थक होगा, जब उसका लाभ राज्य के अंतिम व्यक्ति और अंतिम क्षेत्र तक पहुँचेगा। यदि सीमांचल और कोसी क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बाहर रहेंगे, तो बिहार की प्रगति अधूरी ही रहेगी। बजट को केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, संतुलित और संवेदनशील विकास का माध्यम बनाना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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