संपादकीय, Editorial: ( रीना एन सिंह)
फरवरी 2026 में बिहार विधानसभा में पेश बजट 2026-27 को सरकार ने ‘ज्ञान, विज्ञान और आर्मान’ का दस्तावेज बताया है। 3.47 लाख करोड़ रुपये का यह बजट पिछले वर्ष से काफी बड़ा है और रोजगार दोगुना करने, आय दोगुनी करने, महिलाओं-युवाओं-किसानों के लिए योजनाओं, सामाजिक कल्याण पर 7,724 करोड़ और महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने जैसी घोषणाओं से भरा पड़ा है। राज्य की टैक्स आय 65,800 करोड़ अनुमानित है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि का दावा किया जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण में पटना सबसे अमीर जिला बताया गया है और विकास दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर दिख रही है। लेकिन विकास का मूल्यांकन केवल आंकड़ों से नहीं, जमीन पर महसूस होने वाले बदलाव से होता है। सवाल यह है कि क्या यह विकास बिहार के हर क्षेत्र तक समान रूप से पहुँचा है? क्या सीमांचल, कोसी और उत्तर बिहार भी इस विकास यात्रा में बराबरी से शामिल हैं?
बजट में किसानों के लिए सिंचाई, फसल बीमा और कृषि यंत्रीकरण की घोषणाएँ स्वागतयोग्य हैं, लेकिन सीमांचल का किसान आज भी बाढ़, बाजार पहुंच और लागत संकट से जूझ रहा है। हर वर्ष आने वाली बाढ़ किसानों की मेहनत को मिट्टी में मिला देती है, जबकि स्थायी समाधान—कोसी-सप्तकोशी हाई डैम, महानंदा फ्लड मैनेजमेंट के शेष चरण, कोसी-मेची लिंक प्रोजेक्ट—कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं। बजट में बाढ़ नियंत्रण के लिए प्रावधान जरूर हैं, लेकिन सवाल बार-बार उठता है कि क्या बिहार हर साल केवल बाढ़ से लड़ने की रणनीति बनाएगा या स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास करेगा? सीमांचल के लिए बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुकी है।
महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों, छात्रवृत्ति और स्वास्थ्य योजनाओं का विस्तार सराहनीय है, लेकिन असली चुनौती महिलाओं को योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। शिक्षा और खेल के क्षेत्र में सुधार की बातें की गई हैं, परंतु सीमांचल में आज भी उच्च शिक्षा संस्थानों, प्रशिक्षित शिक्षकों और आधुनिक खेल सुविधाओं का अभाव स्पष्ट है। उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की नीति की चर्चा हुई है, लेकिन पूर्णिया और सीमांचल में बड़े उद्योगों की स्थापना के लिए ठोस रोडमैप नहीं दिखाई देता। जब तक इस क्षेत्र में उद्योग और रोजगार के अवसर नहीं बढ़ेंगे, तब तक युवाओं का पलायन रोकना संभव नहीं होगा।
पर्यावरण और स्वच्छता के लिए बजट में कुछ घोषणाएँ जरूर की गई हैं, लेकिन पशु-पक्षी संरक्षण के प्रति बजट की उदासीनता चिंता का विषय है। नीलगायों को समस्या मानकर निशानेबाज बुलाकर उन्हें मारने की घटनाएँ विकास की नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की प्रतीक हैं। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कल्पना अधूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पूर्णिया और सीमांचल को इस बजट से क्या मिला? बजट दस्तावेज में पूर्णिया या सीमांचल के लिए कोई विशेष पैकेज, कोई बड़ी औद्योगिक परियोजना, कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का शैक्षणिक संस्थान या बाढ़ के स्थायी समाधान की स्पष्ट योजना नहीं है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि से जुड़ी सामान्य घोषणाओं का लाभ इस क्षेत्र को भी मिलेगा, लेकिन सीमांचल के लिए अलग से कोई ऐतिहासिक या निर्णायक घोषणा नहीं हुई। यह क्षेत्र एक बार फिर सामान्य योजनाओं के भरोसे छोड़ दिया गया प्रतीत होता है।
बिहार का विकास तब ही सार्थक होगा, जब उसका लाभ राज्य के अंतिम व्यक्ति और अंतिम क्षेत्र तक पहुँचेगा। यदि सीमांचल और कोसी क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बाहर रहेंगे, तो बिहार की प्रगति अधूरी ही रहेगी। बजट को केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, संतुलित और संवेदनशील विकास का माध्यम बनाना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसमें जाति, क्षेत्र और वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। विकास की रोशनी हर कोने तक पहुँचे, यही असली ‘ज्ञान, विज्ञान और आर्मान’ होगा।



