संपादकीय, Editorial

मौसम जाड़े का यह उफान पर है
सर्द की शीतलता भी उफनाई है
कुहासे की गति सी हो गई जिंदगी
ठहरे हैं काम इतनी कनकनाती है।।

रूह भी बदन के अंदर सहम गईं है
वस्त्र भी सिहरे, कान कनकनाये हैं
कुहासे को चीरती जाती रौशनी
जिंदगी मौत से हाथ आजमाती है।

जीवन जीने को जूझता यौवन
करो या मरो के साथ घिसट रहा
अग्नि,रजाई ,कमरे ,मैखाने में भी
बदन थड्थड़ाती कंपकंपाती है।

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