कुरसेला-बिहारीगंज रेल परियोजना: 50 साल पुराने सपने को मिलेगी रफ्तार या फिर एक और चुनावी छलावा?

पूर्णिया, अभय कुमार सिंह: बिहार के कोसी और सिमांचल क्षेत्र के लोगों के लिए कुरसेला-बिहारीगंज रेल लाइन एक अधूरा सपना बनकर रह गया है, जिसे अब लगभग 50 वर्षों बाद फिर से जीवित करने की कोशिश हो रही है। 1974 में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र ने इस रेल लाइन की परिकल्पना की थी, जिससे बाढ़ प्रभावित इस पिछड़े इलाके को मुख्यधारा से जोड़ा जा सके और यहां के लोगों को विकास का रास्ता मिल सके। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के बाद यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई और तब से लेकर आज तक हर चुनाव में यह मुद्दा केवल वोट बटोरने का साधन बनकर रह गया है। अब एक बार फिर 12 सितंबर से इस रेल लाइन का नया सर्वे शुरू हुआ है, जिसे लेकर उम्मीद और संदेह दोनों की स्थिति बनी हुई है।

दिलचस्प बात यह है कि इस बार का सर्वे पूर्व के 2009 के सर्वे से बिल्कुल उल्टा है — अब रूट टीकापटी के दक्षिण-पश्चिम बहियार से होते हुए, ग्वालपाड़ा, आजोकोपा और छर्रापट्टी जैसे गांवों के बीच से निकाला गया है, और कहीं भी एसएच 65 को पार नहीं कर रहा है, जिससे पहले के मुकाबले जमीन अधिग्रहण की प्रकृति पूरी तरह बदल गई है। केंद्र सरकार ने इस बार 170.8 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है और कोलकाता की एक निजी कंपनी ने डीपीआर से जुड़ा सर्वे और ड्रोन मैपिंग का कार्य शुरू कर दिया है, जो 15 दिनों तक चलेगा। इसके बाद मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी जाएगी और स्वीकृति मिलने पर निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि इस प्रक्रिया को लेकर स्थानीय लोगों की भावनाएं बंटी हुई हैं — कुछ इसे विकास की जीवनरेखा मानते हैं, जबकि कई गरीब किसान अपनी जमीन खोने की आशंका से चिंतित हैं, क्योंकि उनके जीवन का एकमात्र सहारा वही थोड़ी-सी कृषि भूमि है।

पहले की तरह इस बार भी यह डर बना हुआ है कि क्या यह सर्वे असली शुरुआत है या फिर सिर्फ आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर एक बार फिर जनता की भावनाओं से खेला जा रहा है। जिस तरह से सड़कों का विकास हो चुका है, कुछ लोगों का मानना है कि अब रेलवे की ज़रूरत पहले जैसी नहीं रही, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभों को नकारा नहीं जा सकता। अब देखना होगा कि यह योजना ज़मीन पर कब उतरती है या फिर एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराता है।

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